संघर्ष से संन्यासी तक का सफर: सूरज से स्वदेशानंद और देश से विदेश तक की यात्रा

Anchal Sharma
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गरीबी और अभावों में जन्मे सूरज से बने स्वदेशानंद का जीवन संघर्ष , नेतृत्व और समर्पण की अनूठी मिसाल , पढ़िए आगे….

डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |

गरीबी में जन्म, संघर्ष में बचपन

कन्हैया के घर आठवें संतान के रूप में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में सूर्योदय के समय जन्मे सूरज ब्रम्हे का पालन-पोषण बेहद सीमित संसाधनों में हुआ। पिता एक छोटी सरकारी नौकरी में थे और दस बच्चों का पालन-पोषण परिवार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
घर की हालत देखकर सूरज ने महज 10 वर्ष की उम्र में ही पिता का सहारा बनने का फैसला किया। पढ़ाई के साथ-साथ बाजारों में छोटी-छोटी दुकानें लगाकर उन्होंने परिवार की जरूरतें पूरी करनी शुरू कर दीं।

संघ, शाखा और अखाड़े से नेतृत्व की नींव

बचपन से ही संघ की शाखा में जाने वाले सूरज को पहलवानी और समाज सेवा का विशेष शौक था।
10 वर्ष की उम्र में वे हनुमान व्यायाम शाला में गुरु मो. बशीर के सान्निध्य में अभ्यास करने लगे।
नेतृत्व गुण बचपन से ही उभरने लगे—

प्राथमिक शाला में शाला नायक

मिडिल स्कूल में शाला नायक

हाई स्कूल में शाला नायक

हनुमान व्यायाम शाला के प्रथम अध्यक्ष

बजरंग दल के गठन के साथ ही वे बालाघाट जिले के प्रथम बजरंग दल अध्यक्ष बने।

14 साल की उम्र में पहली जेल यात्रा

1975 की आपातकालीन परिस्थितियों के बाद 1980 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध में भारत बंद हुआ, तब सूरज ब्रम्हे के नेतृत्व में बैहर बंद कराया गया।
इसी दौरान उन्हें पेट्रोल पंप से गिरफ्तार कर बालाघाट जेल भेजा गया। उस समय उनकी उम्र मात्र 14 वर्ष थी।

बालाघाट जिले के जिन नेताओं को जेल भेजा गया, उनमें शामिल थे—
कंकर मुंजारे, रामप्रसाद पाठक, पुराण कुमार अडवाणी, दिलीप भटेरे, शुक्ला जी, फारूक खान और सूरज ब्रम्हे।
हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेश पर अगले ही दिन सभी को बिना शर्त रिहा कर दिया गया।

आंदोलनों की लंबी श्रृंखला

इसके बाद सूरज ब्रम्हे का जीवन आंदोलन और संघर्ष का पर्याय बन गया।
अर्जुन सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह के कार्यकाल तक उन्होंने—

भ्रष्टाचार के खिलाफ

भू-माफियाओं और जंगल माफियाओं के विरुद्ध

सट्टा और अवैध गतिविधियों के खिलाफ

जन समस्याओं को लेकर

लगातार आंदोलन, धरने और रैलियां कीं।

हर 10-15 दिन में एसडीएम कार्यालय बैहर के सामने धरना उनकी पहचान बन गया। कई बार जेल भी गए, लेकिन पीछे नहीं हटे।

हनुमान भक्ति और जलती चिता का आंदोलन

बचपन से बजरंगबली के भक्त रहे सूरज ब्रम्हे 10 वर्ष की उम्र से हनुमान चालीसा का पाठ करते आ रहे हैं।
दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान उन्होंने साथियों के साथ लकड़ी की चिता पर बैठकर 12 दिनों का आमरण अनशन किया।
मांगें न माने जाने पर चिता में आग लगाकर जलती चिता में कूद गए। पुलिस ने समय रहते उन्हें बचाया।

इस आंदोलन के बाद सरकार को झुकना पड़ा और राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत बैहर की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को पट्टे वितरित किए गए।

संघर्ष की विरासत

संघर्ष सूरज ब्रम्हे को विरासत में मिला।उनके दादा बरबाद प्रसाद पांड्या 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेज तहसीलदार को गोली मारने के बाद लापता हो गए। आज तक यह पता नहीं चल सका कि उन्हें कहां फांसी दी गई।अंग्रेजों की प्रताड़ना से पिता को बैहर छोड़ना पड़ा और वर्षों मजदूरी कर परिवार पाला।

नरेंद्र मोदी विचार मंच से राष्ट्रीय पहचान

2004 में गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी विचार मंच का गठन हुआ।
22 जून 2004 को सूरज ब्रम्हे को जिला सह-संयोजक नियुक्त किया गया।
इसके बाद वे—

प्रदेश अध्यक्ष

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

राष्ट्रीय संयोजक

राष्ट्रीय मुख्य संगठन महामंत्री

जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे।

संन्यास की ओर कदम

चित्रकूट में संत समागम के सफल आयोजन के बाद उन्हें अंतरराष्ट्रीय संत बौद्धिक मंच का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।
प्रभु श्रीराम की कृपा से चित्रकूट से उनका गहरा लगाव हो गया और उन्होंने अनुसुइया धाम में संन्यास धारण किया।
राजस्थान के बाबा प्रह्लाद दास आश्रम के महंत श्री बलकानंद गिरि महाराज से दीक्षा लेकर वे पूर्ण रूप से संन्यासी बने और स्वदेशानंद कहलाए।

देश-विदेश में सनातन का संदेश

संन्यास के बाद उनका एक ही लक्ष्य है—
पूरे विश्व के सनातनियों को एक मंच पर लाना और अखंड भारत की अवधारणा को साकार करना।

मुख्य मांगें—

भारत और नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाए

गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा मिले

साधु-संतों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बने

इन 11 सूत्रीय मांगों को लेकर वे देश-विदेश में भ्रमण कर रहे हैं।

2030 का लक्ष्य: 25 करोड़ सदस्य

आज संगठन भारत के सभी राज्यों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, इंडोनेशिया, अमेरिका, यूएई समेत कई देशों में सक्रिय है।
लक्ष्य है 2030 तक 25 करोड़ सदस्य जोड़ना और संत संसद की स्थापना करना।

संघर्ष से संन्यास तक की यह यात्रा बताती है—
सूरज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, साधना और सनातन चेतना का प्रतीक है।

 

 

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