मनुस्मृति समाज के लिए था बड़ा श्राप
डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |
25 दिसंबर भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिन है, जो सिर्फ त्योहारों या महान व्यक्तित्वों के जन्मदिन तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक क्रांति और वैचारिक आज़ादी का भी प्रतीक है। यही वह दिन है जब 25 दिसंबर 1927 को बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया और भारतीय समाज को एक नई सोच की दिशा दी।
25 दिसंबर 1927 — विचारों की आज़ादी का दिन
अक्सर आज़ादी को केवल 1947 से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन सच यह है कि भारत को आज़ाद करने में सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों ही नहीं, बल्कि समाज सुधारकों का भी अहम योगदान रहा। 25 दिसंबर 1927 को बाबा साहेब द्वारा किया गया मनुस्मृति दहन उसी वैचारिक आज़ादी का प्रतीक है, जिसने सदियों से चली आ रही सामाजिक गुलामी को चुनौती दी।
क्यों जरूरी था मनुस्मृति का दहन?
मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ था जिसने समाज को वर्णों में बांट दिया—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इसमें शूद्रों और दलितों को निचले दर्जे पर रखकर उन्हें शिक्षा और अधिकारों से वंचित किया गया। एक ही अपराध के लिए जाति के आधार पर अलग-अलग सजा का प्रावधान था, जो समानता के मूल सिद्धांत के खिलाफ था।
महिलाओं की स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा हमला
मनुस्मृति में महिलाओं की स्वतंत्रता को सख्त रूप से सीमित किया गया था। इसमें कहा गया कि महिला को जीवन भर पुरुष के नियंत्रण में रहना चाहिए—बचपन में पिता के, विवाह के बाद पति के और बुढ़ापे में पुत्रों के अधीन। महिलाओं के लिए असमान नियम और अधिकार तय किए गए, जिससे उनका सामाजिक और व्यक्तिगत विकास बाधित होता था।
संविधान बनाम मनुस्मृति
भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय पर आधारित है, जबकि मनुस्मृति के कई प्रावधान इन मूल्यों के बिल्कुल विपरीत थे। यही कारण था कि बाबा साहेब आंबेडकर ने इसे असमानता, गुलामी और अमानवीयता का प्रतीक मानते हुए 1927 में महाड़ में इसका सार्वजनिक दहन किया।
विरोध भी हुआ, लेकिन इतिहास बना
उस समय मनुस्मृति दहन का तीखा विरोध हुआ, लेकिन बाबा साहेब अपने निर्णय पर अडिग रहे। उनका मानना था कि जब तक विचारों की गुलामी खत्म नहीं होगी, तब तक समाज वास्तव में आज़ाद नहीं हो सकता। अगर यह कदम नहीं उठाया गया होता, तो शायद आज भी भारत जातिवाद की बेड़ियों में जकड़ा होता और महिलाओं की स्थिति कहीं अधिक दयनीय होती।
आज का संदेश
25 दिसंबर को क्रिसमस, अटल बिहारी वाजपेयी जी के जन्मदिवस के साथ-साथ सामाजिक आज़ादी के इस ऐतिहासिक दिन के रूप में भी याद किया जाना चाहिए। यह दिन याद दिलाता है कि आज़ादी सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारधारा बदलने से भी मिलती है।

