राजा ऋषभदेव की विरासत, दर्शन और भारतीय सभ्यता का ऐतिहासिक उत्सव
डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |
- राजा ऋषभदेव की विरासत, दर्शन और भारतीय सभ्यता का ऐतिहासिक उत्सव
- भारतीय सभ्यता के मूल प्रवर्तक थे राजा ऋषभदेव
- ‘भारत’ नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा
- शोभायात्रा और संतों के प्रवचन से हुई शुरुआत
- संत-महात्माओं और विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
- दूसरे दिन शैक्षणिक सहयोग और शोध प्रस्तुतियां
- 1,111 ग्रंथों का ऐतिहासिक लोकार्पण बना आकर्षण
- समापन समारोह में मंत्री आशीष शेलार की उपस्थिति
राजा ऋषभदेव के जीवन, दर्शन और सभ्यतागत योगदान को समर्पित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘ऋषभायन–02’ का सफल समापन मुंबई के कोरा केंद्र मैदान क्रमांक–4, बोरीवली (पश्चिम) में संपन्न हुआ। लब्धि विक्रम जनसेवा ट्रस्ट (LVJST) द्वारा आयोजित इस भव्य आयोजन में देश–विदेश से आए विद्वानों, संतों, नीति-निर्माताओं, उद्योगपतियों सहित एक लाख से अधिक नागरिकों ने सहभागिता की।
भारतीय सभ्यता के मूल प्रवर्तक थे राजा ऋषभदेव
सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के माध्यम से यह स्थापित किया गया कि राजा ऋषभदेव भारतीय सभ्यता के मूल प्रवर्तक थे। वक्ताओं ने कहा कि उद्यमिता, सतत विकास, व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल आधारित शिक्षा जैसी अवधारणाएं पश्चिमी नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यतागत परंपरा में निहित हैं।
‘भारत’ नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा
सम्मेलन में यह तथ्य भी दोहराया गया कि हमारे देश का नाम ‘भारत’, राजा ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर रखा गया है, जिसका उल्लेख श्रीमद्भागवत पुराण में मिलता है। इस विषय पर विद्वानों ने विस्तृत ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत किए।
शोभायात्रा और संतों के प्रवचन से हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत भव्य शोभायात्रा से हुई। इसके पश्चात जैन गच्छाधिपति यशोवर्मसूरीजी महाराज ने आशीर्वचन और आध्यात्मिक प्रवचन दिया।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस ने धर्म परिषद का उद्घाटन किया और ‘ऋषभायन’ ग्रंथ का लोकार्पण किया।
संत-महात्माओं और विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस अवसर पर 1008 महामंडलेश्वर स्वामी राजेंद्र आनंदगिरि जी, प. पू. कोठारी श्री धर्मानंद स्वामी महाराज, डंडी स्वामी जितेंद्र सरस्वती महाराज, प. पू. महंत दयालपुरी महाराज, शांतिगिरि महाराज और गुरु मौली डिंडोरी सहित अनेक संतों ने राजा ऋषभदेव के जीवन और दर्शन पर अपने विचार साझा किए।
दूसरे दिन शैक्षणिक सहयोग और शोध प्रस्तुतियां
सम्मेलन के दूसरे दिन विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) किए गए।
भारत और विदेशों के 150 से अधिक संस्थानों के विद्वानों ने— असि, मसी, कसी,व्यापार और वाणिज्य,ब्राह्मी लिपि,गणित,72कौशल और 64 कलाएं जैसे विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इस दिन केंद्रीय वाणिज्य मंत्री श्री पीयूष गोयल भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
1,111 ग्रंथों का ऐतिहासिक लोकार्पण बना आकर्षण
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण 200 से 500 वर्ष पुराने हस्तलिखित ग्रंथों सहित कुल 1,111 ग्रंथों का ऐतिहासिक लोकार्पण रहा। यह लोकार्पण मुंबई जैन संघ संगठन के तत्वावधान में संपन्न हुआ।
साथ ही भारतीय कला पर आधारित भव्य मंच, प्रदर्शनी स्टॉल्स और इंटरएक्टिव प्रस्तुतियों के माध्यम से प्राचीन शिल्प, व्यापारिक प्रणालियां और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया गया।
समापन समारोह में मंत्री आशीष शेलार की उपस्थिति
सम्मेलन के समापन दिवस पर महाराष्ट्र के सांस्कृतिक एवं आईटी मंत्री श्री आशीष शेलार की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने आयोजन की सराहना करते हुए इसे भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

