जैन दर्शन के अनुसार नवकार मंत्र को चौदह पूर्व का सार मानने का वास्तविक कारण क्या है ?
चौदह पूर्वों में जैन दर्शन के सम्पूर्ण ज्ञान का समावेश हो जाता है। यह ज्ञान की उत्कृष्ट अवस्था है। चौदह पूर्व के ज्ञाता को श्रुत-केवली कहा गया है। चौदह पूर्वों के ज्ञान के द्वारा आत्मा विभाव से निकलकर स्वभाव में स्थिर होकर शुद्ध आत्म-स्वरूप को प्रकट कर सकती है।
पंच परमेष्ठी के नाम स्मरण द्वारा भी आत्मा विभाव से निकलकर स्वभाव में स्थिर होकर शुद्ध आत्म-स्वरूप को प्रकट कर सकती है। इन पाँच पदों को किए जाने वाले नमस्कार में यह सामर्थ्य है कि नमन करते-करते यदि भाव बढ जाएं तो श्रेणी पर आरूढ होकर आत्मा केवलज्ञानी बन सकती है। इसलिए पंच परमेष्ठी को चौदह पूर्वों का सार कहा गया है।
नवकार मंत्र के पाँचों पदों में मोक्ष प्राप्त अथवा मोक्ष मार्ग पर अग्रसर उत्कृष्ट आत्माओं को नमन किया गया है। नवकार मंत्र चरम विनय भाव प्रकट करता है। विनय को धर्म का मूल कहा गया है। यह मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है। विनय रूपी मूल के बिना सम्यग्दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र की प्राप्ति नहीं हो सकती। अतः विनय के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र में प्रथम अध्ययन ही विनय पर है। इस दृष्टि से भी नवकार मंत्र को चौदह पूर्व का सार कहा जा सकता है। चौदह पूर्वधारी भी अंत में पंच परमेष्ठी की ही शरण ग्रहण करते हैं।