देवो , महाव्रत धारी साधु साध्वी ,तपस्वी श्रावक श्राविका की निंदा करने वाला अपने पुण्य को, खत्म करता है *।। – प्रवर्तक पूज्य जिनेन्द्रमुनिजी म.सा.-आंचलिक ख़बरें-राजेंद्र राठौर

News Desk
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आत्मोद्धार वर्षावास में 4 सितम्बर रविवार को पुज्य प्रवर्तक जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. ने विराट धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिनेश्वर देव की हमारे उपर अनंत कृपा है, जिन्होने हमे ऐसा अनुपम ,श्रेष्ठ मार्ग बताया हे । साथ ही धर्म ओर पाप का भी मार्ग बताया है ।धर्म का मार्ग बता कर उस पर चलने की प्रेरणा दी, पाप का मार्ग बता कर उससे दूर हटने का बताया । भगवान संसार के तथा मोक्ष के मार्ग का भी प्रतिपादन करते हे ,इसमें संसार का मार्ग छोड़ना हे । आपने आगे कहा कि वितरागी तथा सरागी देवों की निंदा करने वाला गाढे, चिकने महामोहनीय कर्म का बंध करता हे । निंदा मीठी लगती हे, करने मे रस आता है , आनंद आता हे । धर्मी तथा अधर्मी की भी निंदा होती हे । व्यक्ति किसी की गलती, दोष देख कर उसे बताते है तथा लिखकर भी देते हे । निंदा जड पदार्थो की भी होती हैे, पशु की भी, देव की भी होती है, कोई भी अछूता नही है।, देव के 2 प्रकार हे, वितरागी तथा सरागी देव । अरिहंत सिद्ध भगवान वितरागी देव है । अरिहंत भगवान सभी विकारों, रागद्वेष से रहित ,उत्तम भाव वाले होते है परन्तु स्वार्थी जीव इनकी भी निंदा करते हे । अपना काम नही हुआ, मैने इतनी माला गिनी, इतना धर्म किया, कोई लाभ नही हुआ, ऐसा स्वार्थी व्यक्ति सोचते हे । वितराग अनंतगुण के स्वामी होते है, उनके साक्षात दर्शन हो जाये तो भव सुधर जाये, शुद्ध भाव से भक्ति करेें तो भव सुधर जाये । सरागी देव की भी कुछ निंदा करते हे, पर किसी का काम हो जाऐ तो निंदा नही होती हे । आपने आगे कहा कि देवो के पास इतनी रिद्धि है कि, संसार की सारी रिद्धि एक तरफ, जो उनके पेर की जुती के बराबर भी नही हे । परन्तु कुछ ऐसा सोचते हे कि जब उनके पास इतनी रिद्धि है तो वह क्या काम की, वे मनुष्य का भला क्यो नही करते?निंदा करने वाले का पता कुछ देवों को होता हैे, कुछ को नही । परन्तु देव अपनी रिद्धि किसी को दे नही सकते, क्योकि उनका कल्प नही हे । जीव की इतनी पुण्यवानी नही है, कि वे इसे ग्रहण कर सकें । उनका यश होता हे उनके, शरीर का प्रभाव होता कि कोई उसे सहन नही कर सकता हे । उनके यश का प्रभाव दूर दूर तक होता है । उनके अधीन बहुत सारे देव भी होते हे । कुछ व्यक्ति निंदा करते है कि क्यो नही वे अपने यश से, शक्ति से लोगों का हित करते हे ।? शरीर औदारिक , देवों का शरीर वेक्रिय होता है । उनके वर्ण की भी निंदा करता हे । आपने आगे कहा कि व्यक्ति खाए बिना रह सकता है, पर निंदा करे बिना नही रह सकता है । जब व्यक्ति किसी की निंदा बुराई करता है तो परिणाम की धारा अशुभ ओर बुरी होती हे । निंदा करने वाले पर जब परिणाम आता है उसकी आयुष्य बंध गई तो वह दुर्गति का मेहमान बनता हे ,तथा भव भव तक कष्ट उठाता है तथा गाढे, चिकने महामोहनीय कर्म का बंध करता हे । देवो, महाव्रत साधु-साध्वी तपस्वी, श्रावक-श्राविका की निंदा करने वाले गाढे महामोहनीय कर्म का बंध कर पाप के भागीदार बनते है, ऐसे व्यक्तियों का पाप का उदय आ जाने पर उसकी जुबान भी इसी भव में विकृत हो जाती हे । हमे सभी के सदगुण देखना है,। किसी की भी निंदा करने वाला अपने पुण्य को खत्म करता हे । किसी के सदगुण नही देखे तो उसके दुर्गुण भी नही देखे । किसी के सदगुण देखने पर अपने में भी सदगुण आते हे । गुरू शिष्य को समझाते है, तो यह निंदा नही उसे सुधारना हे । जीवन में अच्छाई लायेगें, सदभाव रखेगें ,किसी की निंदा नही करेगें तो व्यक्ति अपनी आत्मा का उद्धार इसी भव में कर लेगा ।
*मन ,वचन ,काया की क्रिया से कर्म का आत्मा में प्रवेश होता है ।। पूज्य संयत मुनिजी म.सा.
धर्मसभा में अणुवत्स पुज्य संयतमुनिजी म.सा. ने कहा कि जीव अनादि काल से इस संसार मे घुम कर आनंद मना रहा है,घूमने में ही सुख मान रहा हे । सिद्ध भगवान नही घुम रहे है, उनके साथ कर्म नही लगे है, हमारे साथ कर्म लगे हुए हेै । व्यक्ति भटक रहा है, अभी तक थका नही हे, जब थकेगा तब आराम करेगा । संसार के थपेडे खाने के बाद भी जीव को अक्ल नही आई, जिनको अक्ल आई वे पार हो गये । जीव कर्म के कारण भटक रहा हे । कर्म स्वयं ने बांधे हे इसलिये भटक रहा हे । मन, वचन काया की क्रिया से कर्म का आत्मा में प्रवेश होता हे । केवली भगवान ने कर्म एक समय में बांधे दूसरे में भोगे बाद में सारे खत्म । कषाय के कारण आत्मा में कर्म टिकते हैं ।इस आत्मा रूपी कुएं में क्रोध ,मान, माया, लोभ रूपी चार कुत्ते पड़े हुए हैं इनके कारण आत्मा मैली हो रही है। जब तक आत्मा से यह निकलेंगे नहीं तब तक जीव संसार में भ्रमण करता रहेगा हमें इन कषायो को आत्मा से निकालना होगा, निकालने का मन होगा तब निकलेंगे । आत्मा के हित के लिए इन्हें छोड़ना होगा , पाप जीव को दुःखी करते हैं ।चाहे तपस्वी हो, ज्ञानी हो , वेयावच्च करने वाला हो यदि कषाय को हेय हेया ही नहीं समझे तो उसे मोक्ष मार्ग नहीं मिलता । कषाय छोड़ेगा तो जीव आगे बढ़ेगा । अनेक बार जीवन चारित्र लिया पर मोक्ष नहीं हुआ । दीक्षा लेने पर मोक्ष गति अभी नहीं पर देव गति अवश्य मिलती है ।संसार में अधोगति संयम में मोक्ष गति है । संयम की दृष्टि से की जाने वाली क्रिया से कर्म के निर्जरा होती है ,कर्म हल्का होने पर जीव का उद्धार होगा । जीव समझ समझ कर ही मोक्ष में जा सकता है ।, जीव लोभ कषाय में आसक्त होकर दुःख प्राप्त कर रहा है, खतरे उठा रहा है ,अनादि काल से ठगा रहा है । जिसका आयुष्य, पुण्य वानी प्रबल होगा उसका कोई बिगाड़ नहीं सकता है । कषाय पर विजय पाने से आत्मोद्धार होगा । धर्म सभा में रतलाम ,खाचरोद गोधरा, लिमडी ,उज्जैन श्री संघ के पदाधिकारियों ने अपने विचार व्यक्त किए .।उज्जैन नयापुरा संघ ,रतलाम संघ ने आगामी चातुर्मास का ,गोधरा संघ ने होली चातुर्मास की विनती की ।बड़ी संख्या में दर्शनार्थी दर्शन हेतु पधारे। तपस्या के दौर में आज श्रीमती भीनी कटकानी ने 33 ,सुधीर रुनवाल ने 24 कुमारी सोनीका बरवेटा ने 19, श्रीमती सीमा व्होरा ने 18 श्रीमती सीमा गांधी ने 12, श्रीमती पलक जैन ने 12 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए ।श्रीमती शीतल कटकानी का धर्म चक्र , तेला,आयंबिल तप गतिमान हे । पूरे प्रवचन का लेखन सुभाष चंद्र ललवानी ने किया सभा का संचालन प्रदीप रूनवाल ने किया ।

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