कैबिनेट बैठक में अहम निर्णय, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और आम आदमी पर पड़ेगा सीधा असर
डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |
दिल्ली में सांस लेना दिन-ब-दिन चुनौती बनता जा रहा है। प्रदूषण अब सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। इसी बीच दिल्ली सरकार की कैबिनेट बैठक में ऐसे अहम फैसले लिए गए हैं, जो राजधानी के ट्रांसपोर्ट सिस्टम, प्रदूषण नियंत्रण और आम आदमी—तीनों को सीधे प्रभावित करेंगे।
पूरी बस व्यवस्था अब DTC के हवाले
अब तक दिल्ली में बसें DTC, क्लस्टर और DIMTS जैसी निजी व्यवस्थाओं के तहत संचालित हो रही थीं। लेकिन दिल्ली सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए पूरी बस व्यवस्था को सिर्फ DTC के हवाले करने का निर्णय लिया है।
सरकार का दावा है कि इससे एक नियम, एक सिस्टम और एक जवाबदेही सुनिश्चित होगी, बसों की गुणवत्ता सुधरेगी, रूट प्लानिंग बेहतर होगी और सार्वजनिक परिवहन को मजबूती मिलेगी।
“नो PUC, नो फ्यूल” नियम लागू
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए एक और सख्त कदम उठाया है। अब राजधानी में यदि किसी वाहन के पास वैध PUC सर्टिफिकेट नहीं होगा, तो उसे पेट्रोल या डीज़ल नहीं मिलेगा।
यह फैसला उन लाखों वाहनों पर असर डालेगा, जो बिना प्रदूषण जांच के सड़कों पर दौड़ रहे हैं। सरकार का साफ संदेश है—या तो नियमों का पालन करें या वाहन खड़ा रखें।
सरकार का दावा: प्रदूषण घटेगा, बसों में बढ़ेगी भीड़
दिल्ली सरकार का मानना है कि इन फैसलों से ज्यादा लोग निजी वाहनों की बजाय बसों का इस्तेमाल करेंगे। इससे सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम होगी और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। सरकार इसे केवल ट्रांसपोर्ट सुधार नहीं, बल्कि “सांस बचाने की लड़ाई” बता रही है।
जनता के बीच उठे सवाल
हालांकि इन फैसलों को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। क्या DTC अकेले पूरी दिल्ली की बस व्यवस्था संभाल पाएगी? क्या बसों की संख्या और समय-सारिणी में सुधार होगा या यात्रियों की परेशानी बढ़ेगी? “नो PUC, नो फ्यूल” नियम आम आदमी पर बोझ डालेगा या वाकई प्रदूषण घटाएगा?
समर्थन और विरोध दोनों
कुछ लोग इन फैसलों को साहसिक और जरूरी कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे जबरदस्ती थोपे गए नियम मान रहे हैं। साफ है कि दिल्ली सरकार का यह निर्णय सिर्फ बसों या ईंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़ा संदेश है—सिस्टम बदलेगा, नियम सख्त होंगे और लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ेगी।
अब आगे क्या?
अब देखना यह होगा कि ये फैसले दिल्ली की हवा को साफ करने में कितने कारगर साबित होते हैं या फिर सड़कों पर नई बहस और चुनौतियां खड़ी करते हैं।

