अफगानिस्तान में भूकंप से तबाही: गांव के गांव उजड़ गए, सैकड़ों की जान गई

Aanchalik Khabre
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Earthquake

अफगानिस्तान एक बार फिर भूकंप की मार झेल रहा है। इस बार तबाही इतनी बड़ी है कि गांव के गांव बर्बाद हो गए हैं। नंगरहार और कुनार जैसे पहाड़ी इलाकों में आधी रात को आई आफत ने सैकड़ों ज़िंदगियाँ छीन लीं और हजारों को घायल कर दिया। अफगानिस्तान, जो पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक संकट झेल रहा है, अब एक और मानवीय आपदा के मुहाने पर खड़ा है।

रात के अंधेरे में कांप उठी ज़मीन

यह भूकंप रविवार की रात 11:47 बजे आया। इसकी तीव्रता 6.0 मापी गई, और इसका केंद्र जलालाबाद शहर से 27 किलोमीटर दूर, नंगरहार प्रांत में था। गहराई केवल 8 किलोमीटर थी, जो इसे और भी खतरनाक बनाती है। छोटे गहराई वाले भूकंप ज़मीन पर ज्यादा नुकसान करते हैं, और यही इस बार भी हुआ। इसके बाद भी कई झटके महसूस किए गए, जिससे लोग पूरी रात दहशत में रहे।

मलबे में तब्दील हो गए गांव

सबसे ज़्यादा नुकसान कुनार प्रांत में हुआ, खासकर नूरगल जिले में। यहां के एक निवासी ने बताया, “पूरा गांव तबाह हो गया है। बच्चे, बूढ़े, जवान, सब मलबे के नीचे दबे हैं।” उनकी बातों में बेबसी और दर्द साफ झलकता है। “हमें मदद की ज़रूरत है, कोई नहीं है जो शवों को बाहर निकाले,” उन्होंने कहा।

लोग अपने हाथों से मलबा हटाने की कोशिश कर रहे हैं। ना मशीनें हैं, ना संसाधन। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे लोग अपने परिजनों को खोजने के लिए खुद ही मलबे के ढेर में कूद पड़े हैं।

जीवित बचे लोगों की दर्दनाक कहानियाँ

ऐसी तबाही में हर घर की एक अपनी कहानी होती है। माजा दारा नाम के इलाके में रहने वाले सादिकुल्लाह ने बताया कि उसकी नींद एक जोरदार धमाके से खुली। उसे लगा कोई तूफान आ गया है। वह दौड़कर अपने बच्चों के पास गया और तीन को बचा पाया। लेकिन जब बाकी परिवार को लाने के लिए लौटा, तो छत उसके ऊपर गिर गई। उसकी आवाज़ में दर्द था, और उसकी आँखों में डर अब भी था।

बचाव कार्य जारी, लेकिन संसाधनों की भारी कमी

तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने पुष्टि की कि मृतकों की संख्या 800 के पार पहुंच चुकी है, और 2,500 से अधिक लोग घायल हुए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता शराफत जमान ने कहा कि बचाव कार्य जारी है। काबुल, नंगरहार और आसपास के क्षेत्रों से मेडिकल टीम भेजी गई हैं, लेकिन अब भी कई इलाके ऐसे हैं जहां से कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।

संभावना जताई जा रही है कि जैसे-जैसे जानकारी आएगी, मौतों और घायलों की संख्या और बढ़ सकती है।

पूर्वी अफगानिस्तान का भूगोल और चुनौतियाँ

पूर्वी अफगानिस्तान में पहाड़, दुर्गम रास्ते और सीमित बुनियादी सुविधाएँ हैं। संचार पूरी तरह से ठप हो चुका है। सड़कों की हालत खराब है, जिससे राहत कार्य प्रभावित हो रहे हैं। जलालाबाद जैसे बड़े शहर भी झटकों से अछूते नहीं रहे। यहाँ की अधिकांश इमारतें ईंट, मिट्टी और लकड़ी से बनी होती हैं, जो भूकंप के झटकों को सहने में असमर्थ हैं।

यह क्षेत्र पाकिस्तान की सीमा से सटा हुआ है और व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। अनुमान है कि जलालाबाद की आबादी लगभग 3 लाख है, लेकिन आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर यह संख्या कहीं अधिक है।

पहले भी झेल चुका है अफगानिस्तान ऐसा दर्द

यह पहली बार नहीं है जब अफगानिस्तान ने ऐसी त्रासदी झेली हो। अक्टूबर 2023 में भी 6.3 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें तालिबान सरकार के अनुसार 4,000 लोग मारे गए थे। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने यह संख्या 1,500 बताई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि आंकड़े कुछ भी कहें, हर आपदा में हज़ारों परिवार उजड़ते हैं।

मदद की गुहार और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की ज़रूरत

अफगानिस्तान की जनता एक बार फिर दुनिया से मदद की उम्मीद कर रही है। भूकंप की मार झेल रहे लोग किसी राजनीतिक पहचान या विचारधारा से नहीं, बल्कि मानवीय स्तर पर मदद चाहते हैं। उनके लिए धर्म, जाति, सरकार कुछ मायने नहीं रखती  उन्हें सिर्फ भोजन, दवा, और सिर पर छत चाहिए।

तालिबान सरकार ने कहा है कि जान बचाने के लिए सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी बेहद ज़रूरी है। अफगानिस्तान की हालत पहले ही नाज़ुक है, और ऐसी आपदा में अकेले लड़ना मुश्किल है।

एक चीख जो सुनाई नहीं देती

हर भूकंप के पीछे सिर्फ आँकड़े नहीं होते – 800 मौतें, 2,500 घायल। इसके पीछे हैं वे मांएं जिन्होंने अपने बच्चे खोए, वे बच्चे जो अब अनाथ हो गए, वे बुज़ुर्ग जो अपनी ज़िंदगी की अंतिम घड़ी अकेले बिताने को मजबूर हैं।

यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है – यह एक मानवीय त्रासदी है। और यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस चीख को सुना जाए, इस दर्द को साझा किया जाए।

पुनर्निर्माण से पहले ज़रूरी है पुनरुत्थान

भूकंप से उजड़े अफगानिस्तान को सिर्फ दीवारों और छतों की नहीं, हिम्मत, मदद और उम्मीद की ज़रूरत है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, पड़ोसी देशों और मानवता में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति को आगे आना चाहिए। यह समय राजनीति का नहीं, इंसानियत का है।

जो गांव उजड़ गए हैं, वो फिर से बसेंगे। लेकिन जिन ज़िंदगियों के चिराग बुझ गए, उन्हें हम नहीं लौटा सकते। हम बस इतना कर सकते हैं कि जो बचे हैं, उनके लिए एक सुरक्षित, सशक्त और सहारा देने वाला भविष्य तैयार करें।

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