कविशाला की आगाज पहल की शुरुआत शहर के आईएस, संगीतकार और कवि डा. हरिओम और प्रसिद्द कवि आईएस अखिलेश मिश्रा ने किया, दोनों ने अपनी कविताओं के साथ आज की कविताओं परिचर्चा की ! केवल सपने देखना जीवन का सच नहीं होता उन सपनो के लिए कुछ करना पड़ता है ! प्रथम दिवस में कविता संवाद सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें लखनऊ के वरिष्ठ साहित्यकार अखिलेश मिश्र, डॉ. हरिओम, मालविका हरिओम, पंकज प्रसून एवं दिल्ली से पधारे अस्तित्व ‘अंकुर’ ने कविता के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
अस्तित्व अंकुर जी ने कहा कि कविता अपने अच्छे दौर से गुज़र रही है। विभिन्न प्लेटफॉर्म उपलब्ध होने से जनसामान्य में कविता के प्रति रुचि बढ़ी है एवं लोगों के अन्दर छुपे कविता के बीज आसानी से प्रस्फुटित हो पा रहे हैं। उन्होंने अपने काव्य पाठ में कहा –
“अब तक उसके सर कोई इल्ज़ाम नहीं;
शायर अच्छा है लेकिन दरबारी है।”
“चच्चा बेसब्री से काम नहीं होंगे;
वक़्त लगेगा, यह दफ़्तर सरकारी है।।”
मालविका हरिओम जी ने वर्तमान भारतीय विसंगतियों के दौर में मंचीय कविता के शोधन को महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि मंचों पर कुछ कवि उग्र हो जाते हैं, द्वेष फैलाते हैं इसे रुकना चाहिए।
डॉ. हरिओम ने अपनी विख्यात ग़ज़ल “मैं तेरे प्यार का मारा हुआ हूँ।
सिकन्दर हूँ मगर हारा हुआ हूँ।।” तरन्नुम में सुनाकर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया।।
वरिष्ठ साहित्यकार अखिलेश मिश्र जी ने साहित्य के समाज के विकास में उपयोगी बताते हुए कुछ ग़ज़लें एवं गीत सुनाये –
“जिस शहर में हम बड़े मशहूर थे;
कल वहाँ का आबोदाना हो न हो।।”
दूसरे दिन की दिन कविशाला आग़ाज़ की शुरुआत नए कवियों की कविताओं के साथ हुयी, लखनऊ शहर के नए कवियों ने तात्कालिक मुद्दों का अपनी कविताओं के जरिये सामने रखा ! आगाज में इस पर्व में एक अलग उत्साह देखा गया! प्रेम, देश प्रेम, सामाजिक मुद्दों इत्यादि पर अद्वितीय कवितायेँ कवियों ने साझा की !
नए कवियों की कविताओं के बाद देश के स्माइल मैन सर्वेश अस्थाना ने अपनी कविताओं के जरिये लखनऊ के कविता प्रेमियों को खूब हसाया! हमेशा अपनी कविताओं के माध्यम से देश की समस्याओ पर सवाल उठाते रहते है ! 20 करोड़ से ज्यादा आबादी होने के बावजूद यूपी में अवसरों की कमी है। बेरोजगारों की संख्या यहां करोड़ों में है।
पैसा लेकर आइए खुला हुआ बाजार, मन चाही सब नौकरी, पाओ मेरे यार!
कवि सर्वेष अस्थाना के मुताबिक पहले कहा जाता था कि प्रतिभा का धन से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन यह बात अब गलत नजर आती है। अब धन के आधार पर एडमिशन मिल जाता है, कई जगहों पर नौकरी भी मिल जाती है। अब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला मामला है। यानि जिसके पास धन है वह अवसर भी ढ़ूंढ़ ले रहा है, लेकिन जो करीब है वो बेचारा परेशान है!
नए कवियों के मंच के बाद, देश के जाने माने कविता साहित्य गुरु ओम नीरव लिए एक वर्कशाप रखी, जिसमे नयी कविताओं में अच्छाइयों और बुराइयों पर बात की गयी! नए कवियों को लिखने के साथ साथ क्या क्या देखना चाहिए और लिखने पहले और बाद में किन चीजों ख्याल रखना चाहिए ! उन्होंने अपनी कविता लोगो के सामने रखी :
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी,
कर लो थोड़ा मन में विचार ठहरो साथी!
दासता-निशा का भोर कहो किसने देखा?
जंगल में नाचा मोर कहो किसने देखा?
अबतक उसका है
इंतजार ठहरो साथी!
आगे है भीषण अंधकार ठहरो साथी!
अगले सत्र मप्रसून के पंच सत्र में व्यंग्यकार पंकज प्रसून ने राजनैतिक सामाजिक एवं आर्थिक विसंगतियों पर व्यंग्य पढ़ें । डा हैदराबाद की पशु चिकित्सक डॉ प्रियंका रेड्डी पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा –
तुम पशु चिकित्सक थी,
चार पैर वाले पशुओं को जानती थी, पर गलती कर गई
दो पैर वाले पशुओं को पहचानने में”
उन्होंने गिरते रुपये पर तंज कसते हुए कहा-
” मुझे अपने देश के रुपये पर नाज़ है
क्योंकि हमारे देश का रुपया विदेशी बैंकों का सरताज है”
हॉल ही में संसद सत्र के दौरान में नेताओं के सोते हुए पाये जाने पर उन्होंने पढा-
‘वह बोले- मेरे ऊपर लगाते गए सारे आरोप निराधार हैं
जब विपक्ष के नेता सवालों की बौछार फेंक रहे थे
तो हम नींद में देश के विकास का सपना देख रहे थे”
पंकज प्रसून ने कहा कि व्यंग्य व्यवस्था पर होता है व्यवस्थापकों पर नहीं, प्रवृत्ति पर होता है व्यक्ति पर नहीं!
तहरीक सत्र में क्षितिज कुमार और अभय निर्भीक अपनी कविताओं के जरिये समाज को आइना दिखाने का प्रयास किया ! ओजस्वी स्वर के युवा हस्ताक्षर अभय सिंह निर्भीक कवि सम्मेलन की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। ये शिक्षा से इंजिनियर हैं। अम्बेडकर नगर के कहरा सुलेमपुर के मूल निवासी हैं। गांव, घर और खेती- बाड़ी से भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं।
उन्होंने कहा
“भारत माता का हरगिज़ सम्मान नहीं खोने देंगे
अपने पूज्य तिरंगे का अपमान नहीं होने देंगे”
क्षितिज कहते हैं इंसान को खुद से रूबरू कराती है कविता!
– मुझे देखो कि क्या करना नहीं है, मैं सब हारे हुओं का देवता हूँ!
युवा स्वर में आयशा आयुब ने सुकान्त तिवारी और अक्स समस्तीपुर के साथ अपनी कविताये लखनऊ शहर सामने रखी
आयशा अयूब ने कहा : ग़म, ख़राबे, तीर्गी, आँसू, ख़ला, आशुफ़्तगी और भी कुछ हो अगर तो, वो भी ला.. रोएँगे हम!
सुकान्त ने गजब आवाज में लोगो को सुनाया : शाम को ऐसे छत पर न आया करो, चाँद कर दे न तुम पर मुक़दमा कहीं!
आखिरी में अक्स समस्तीपुरी ने अपनी कविताओं के जरिये कविता प्रेमियों का मन मोह लिया, उनका कहना था: अहले दुनिया के हैं सताए हुए, एक तुम ही नहीं हमारा दुःख!
दूसरे दिन आखिरी सत्र अस्तित्वा अंकुर की कविताओं कविताओं के साथ ख़त्म हुआ ! उन्होंने अपनी कविताओं को संगीत के साथ लखनऊ के सामने रखा !
‘कविशाला’ एक अभिनव उपक्रम है, जो नए कवियों को एक मंच प्रदान कर रहा है.
कविशाला आग़ाज़’ में एक ही छत के नीचे आपको नए और स्थापित दोनों ही कवि और उनकी कविताएँ मिलेंगी। नए चर्चित नाम, अपनी प्रेरणाओं व गुरुओं के समक्ष अपनी प्रतिभा का निष्पादन करेंगे। ठीक उसी समय उसी मंच पर बड़े उस्ताद अपनी कविता, अपनी यात्रा और अपने अनुभवों को हमसे साझा करेंगे।