जयाजी, आईये देश की बेटीयां बचाये, शूरूआत फिल्मों से करे-आँचलिक ख़बरें-हेमा माधवानी

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एक बडा प्यारा सा गीत है बीते जमाने का-जब जब बहार आई और फूल मुस्काराये..मुझे तुम याद आये…मुझे तुम याद आये……!
ऐसा ही कुछ अब धीरे धीरे मेरे भारत में हो रहा है. जब जब गेंगरेप हुये और कोई कली मुरझाई,,, मोमबती मुझे तुम याद आई….!

हैदराबाद में एक सरकारी महिला डाक्टर के साथ 4 अपराधीयों ने जो किया उसे लेकर संसद से सडक तक लोगों का खास कर महिलाओं का गुस्सा फूट रहा है. हैदराबाद की महिलाओं ने अपराधीयों को तुरन्त फांसी और बीच सडक पर खडा कर उसे पीट पीट कर मार डालने का भी कीसी ने कहा. उसी बात को राज्यसभा में भी जया बच्चन ने कहा सडक पर कहना और संसद के सदन में कहना, दोनों के बीच फर्क है.

जया बच्चन फिल्म अभिनेत्री है. फिल्म गुड्डी से उन्हों ने अपने फिल्मी करियर की शूरुआत की थी. काफी फिल्मों में काम किया है. कभी खुशी कभी कम फिल्म में अपने पति अमिताभ के साथ रोल किया.सपा ने उन्हें संसद में बिठाया है. वे निर्विवाद सांसद और अभिनेत्री रही है. देश उनका सम्मान करता है. हैदराबाद की गेंग रेप वारदात को निर्भया कांड-2 के रूप में देख जा रहा है.

जयाजी नें संसद में आन रिकार्ड कहा की गेंगरेप के ऐसे मामले में दोषितों को भीड को सौंप देना चाहिये, उसका मोब लीचींग कर उसे सरेआम बीच सडक पर भीड द्वारा पीट पीट कर मार डालने से ही अपराधी डरेंगे. बच्चा चोर के शक में भारत में कई निर्दोष लोगो को पीट पीट कर मोत के घाट उतारने की वारदातें कोई पुराना इतिहास नहीं है. प्रधानमंत्री ने भी इस मोब लीचींग का विरोध किया था. इसी मोब लीचींग को रोकने देश के 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री को खुल्ला खत लिखा था. हालांकी फिर उन्हें परेशान किया गया ये एक अलग बात है.
जयाजी, आपने जीस मोब लीचींग की सलाह दी है हो सकता है की कोइ उसे अंजाम भी दे दे. लेकिन समाज में जो होता है या हो रहा है उसके लिये फिलमें जिम्मेवार है या नहीं…?

हैदराबाद की इस घटना में चार अपराधीओं ने महिला डाक्टर को अगुवा किया, सुनसान जगह पर ले गये. खुद भी शराब पी और पिडिता को भी जबरन पिलाने की कोशिश की. दुष्कर्म करने के बाद सबूत मिटाने के लिये उसकी लाश को जला कर फेंक दी. जैसा की कीसी फिल्मों में दिखाया जाता है.
अजय देवगन की फिल्म द्रश्यम को देख कर उसी तरह से हत्या के कुछ किस्से समाज में बने. फिल्म में हत्यारा हाथ नहीं लगता लेकिन फिल्म देख कर वाकई जिसने हत्या की उस वारदात में हत्यारे पकडा गये. फिल्म तो फिल्म है और वास्तविक जीवन अलग होता है.

फिल्मों का समाज पर प्रभाव पडता है. समाज में कई ऐसे है, जिनकी संख्या अनगिनत है, वे फिल्मों में दिखाया गया अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते रहते है. नायिका ने कैसे कपडे पहने, कौन सी फैशन चल रही है, घर परिवार, प्यार के सीन, सुहागरात के सीन, मारामारी, गुस्सा ताव के संवाद आदि. देख कर समाज उससे प्रभावित नहीं होता ऐसा यदि कोइ कहे तो वह मूरख है. अपने हीरो या हिरोइन ने जीस डिझाइन के जीस रंग के कपडे पहने हो वैसे ही पहनना ये आम हो गया है.

फिल्मों में रेप के गंदे सीन दिखाते है. नायक-नायिका को मदहोश हालत में प्यार करते दिखाते है. बेडरूम के द्रश्य आज फिल्मों मे कामन हो गये है. फिल्में पहले भी बनती थी. उसमें भी प्यार के सीन दिखाते थे. लेकिन किस तरह…? हीरो-हिरोइन के चेहरे को नजदिक ला कर फिर दो फूलों को आपस में मिलते दिखाते थे. दर्शक समझ जाते थे. पहले की हिरोइन कम कपडों में नहीं लेकिन पूर्ण वस्त्रो में. फिर भी मन को हरनारी मनोहारी लगती थी. उन्हें देख कर मन में कोइ गलत विचार कतई ही आते थे. लेकिन आज…?

फिल्म में स्वीमिंग पुल का द्रश्य डाला जायेंगा। दो पीेछे जैसे अंतरंग वस्त्रो में दिखायेगें. जाहिर है की साडी पहन कर तो स्वीमिंग पुल में नहा नहीं सकते. जयाजी, याद कीजीये फिल्म बोबी का वह द्रश्य जिस में डिम्पल कापडिया टु पीस में सीवीमिंग पुल से बाहर आ रही है.

फिल्म राम तेरी गंगा मैली में मंदाकीनी का द्रश्य क्या था…? जयाजी, यब कामूक द्रश्य कई दर्शको ने एक मा के रूप में नहीं लेकिन नग्नता के रूप में देखा ये हकीकत है. फिल्मवाले भी यही चाहते थे. फिल्म फायर में शबाना आझमी और नंदितादास के बीच कामुक संबंधो क्यों दिखाया गया…? क्यों लेस्बियन को बढावा दिया गया..?

आज की फिल्मों में हिरोइन को इतने कम कपडे में दिखाते है की उसके छोटे कपडें माचिस में समा जाय….! इन सब का प्रभाव कोरे मन में पडता है. उसे दोहराने के प्रयास में रेप और गेंगरेप जैसी वारदाते हो रही है, इससे कोइ इन्कार नहीं कर सकता. क्यों, आजकी फिल्में या टीवी सिरियलों में अभिनेत्रीयों को दो पीेछे या अंडरगार्मेंट पहन कर पेश की जाती है….? इसका प्रभाव ये देखने को मिलता है की छोटी छोटी लडकियों को ऐसे ही कपडें पहनायें जा रहे है. फिर रेप के किस्से नहीं होंगे तो क्या होंगे…? राखी सावंत जैसी अभिनेत्रीयां क्या दिखा रही है, कोई कहेंगा…? जीम के होट फोटो किस के लिये है…?
जयाजी, ऐसी वारदातों के लिये फिल्म वालें भी कम जिम्मेवार नहीं है. बोलीवुड, टेलिवुड, कोलीवुड…न जाने कितने वुड ने खास कर साउथ की फिल्मों में तो ऐसे कामुक सीन दिखाते है की सारे हदे पार कर देते है. फिर समाज के लोग ऐसे घिनौने अपराध की ओर नहीं बढेंगे तो क्या मंदिर-मस्जीद-गुरूद्वारा-चर्च की ओर कदम बढायेंगे….?

समाज को प्रभावित करने वाले फैक्टर में एक फिल्म फैक्टर भी है. जया बच्चन और संसद में बिराजमान अन्य ऐसे कलाकार की जिम्मेवारी बनती है की वे फिल्म बनाने वालों को भी कहे की वे उनकी फिल्मों में लोकों को उत्तेजित या उकसाने का सीन न दिखाये. अभिनेत्रीयों को पूरे कपडों में दिखाये. महिला को, तु चीज बडी है मस्त मस्त किसने कहा…? क्या महिला कोइ चीज है…? बिकाउ है….?खाने की चीज है…..? फिल्मों में हीरो और हिरोइन द्वारा लगाये जाते कामुकता से भरे ठुमके क्या मेसेज देते है समाज को भला…?

जयाजी, मोब लीचींग वाली आपकी बात से हरकोइ सहमत होंगा. क्योंकि भारत की न्यायप्रणालि ऐसी है की लोगों को लगता है की ऐसे मामले में तो तुरन्त ही फैंसला होना चाहिये. औ वह है-दोषितो का मोब लीचींग. तुरन्त ही न्याय…..! ऐसा दौर भी आयेगा की लोग यही करेंगे. लेकि रेप जैसी घटना को कम करने के लिये फिल्मवालों को भी अपनी मानसिकता में बदलाव लाना ही होंगा. ताकि कोइ फिर से द्रश्यम के द्रश्य को न दोहराये, कोई ऐसा द्रश्य न दिखायें कोइ उसे दोहरा कर की कीसी की जिंदगी से खिलवाड ना करे। इसके साथ ही इंटरनेट पे सिर्फ एक क्लिक पे जो सारी सामग्री उप्लब्धब हो जाती हैं। इसमें सबसे बड़ा रोल इसका हैं और मोबाईल बच्चे के हाथ में स्ट्रांग एडल्ट इंडेन्डिफिकेशन के बाद ही इसके एक्टिवत होना चाहिए क्यों कि यहाँ ज्यादा जरुरत हैं।
जयाजी, आईये देश की बेटीयां बचाये, शूरूआत फिल्मों से करे।

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