भारत का हर नागरिक विभिन्न माध्यमों से अपनी बात कह सकता है. डिजिटल मीडिया कि ताकत को पहचानिये और आवाज बुलंद करिये

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[संतोष प्यासा एवं क़ाज़ी अजमत]

इन दिनों समय समय पर पढ़ने सुनने को मिलता है कि फर्जी पत्रकारों का झुण्ड तैयार हो गया है जो असली पत्रकारों को बदनाम कर रहा है.
यहाँ चिंतनीय बात यह है कि यह कैसे तय हो कि कौन फर्जी पत्रकार है और कौन असली. ज्यादातर लोग असली और फर्जी पत्रकार कि प्रमाणिकता इस बात से तय करते हैं कि जिसके पास किसी प्रतिष्ठित संस्थान का प्रेस कार्ड है वो असली और बांकी फर्जी।

आज पत्रकार को उसकी लेखनी से नहीं बल्कि उसके समाचार पत्र या मीडिया संस्थान के विस्तार और प्रसार से आंका जाता है. क्या पत्रकार को नापने का यह पैमाना सही है ? क्या गले में प्रेस कार्ड , हाथ में माइक और जेब में कलम रखने मात्र से ही कोई असली पत्रकार बन सकता है ?

नहीं बिलकुल नहीं. पत्रकारिता एक पेशा मात्र नहीं बल्कि यह एक जिम्मेदारी है, “पत्रकार को कोई भी विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है.संविधान के अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) को ही प्रेस की स्वतंत्रता के समकक्ष माना गया है।जो अधिकार एक आम नागरिक को प्राप्त हैं वही अधिकार पत्रकार को भी तो ऐसे में क्या असली और क्या फर्जी।

कोई भी व्यक्ति अपनी बात को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त कर सकता है. अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता के अधिकार के साथ साथ देश के प्रत्येक नागरिक को “सिटीजन जर्नलिस्ट” होने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है।

दर असल असली और फर्जी पत्रकर का हो हल्ला वेब न्यूज पोर्टल्स के आने पर ही शुरू हुआ है। इसके पीछे भी एक गूढ़ रहस्य है.डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता में एक नई क्रांति ला दी अब कोई भी घटना होती है तो उसका प्रसार मिनटों में हजारों लोगों तक हो जाता है। पहले किसी भी खबर के प्रकाशन और प्रसारण में समय लगता था और इसी समय में पूरा खेल हो जाता था।

होता ये था कि जब कोई भी खबर मिलती थी तो प्रेस कार्ड धारी पत्रकार उसे भुनाने में लग जाते थे। मसलन किसी अवैध व्यापारी के अवैध व्यापार की जानकारी होने पर कलमचोर पत्रकार उस व्यापारी से मिलकर मोटी रकम ले खबर ही गायब कर देते थे। इसी तरह जब किसी भृष्ट सरकारी अधिकारी के भृष्टाचार का पता लगने पर उस अधिकारी से डील कर ली जाती थी। लेकिन डिजिटल मीडिया के आने से ऐसे कलम चोर पत्रकारों की कमाई का श्रोत ही ख़त्म हो गया है।

अब डील होने से पहले ही वो खबर हजारों लोगों तक पहुँच जाती है कई बार ऐसे कलमचोर पत्रकारों द्वारा ही भर्जी पत्रकार का रोना रोया जाता है इन कलमचोर पत्रकरों के साथ साथ देश के बड़े बड़े मीडिया संस्थान भी इस डील वाले खेल में शामिल है. ये बड़े मीडिया संस्थान न केवल पैसे लेकर खबर विशेष को एक मिशन बना कर प्रसारित करते हैं बल्कि विपक्ष के नेताओं को बदनाम करने तक के लिए पैसे लेकर मिशनरी रूप से खबर चलाते हैं

कुछ समय पहले “कोबरा पोस्ट ने अपने स्ट्रिंग में इंडियन एक्सप्रेस सहित देश के अन्य कई बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के इस डील वाले खेल को उजागर किया था (अगर आपको कोबरा पोस्ट के बारे में नहीं पता तो यकीन मानिये आप एक जिम्मेदार पत्रकार नहीं हैं). जब देश के बड़े बड़े मीडिया संस्थान ही पैसे में अपना ईमान बेंच रहें है तो ऐसे में आप एक पत्रकार को फर्जी कैसे कह सकतें है ? यहाँ तो ऊपर से नीचे तक सभी सिर्फ पैसा बनाने के लिए ही पत्रकारिता कर रहे हैं

ऐसे में एक बिना प्रेस कार्ड वाले, छोटे संस्थान में काम करने वाले या डिजिटल मीडिया में कार्य करने वाले पत्रकार को ही फर्जी कि श्रेणी में क्यों रखा जाये ?

कलम चोर पत्रकारों और भृष्ट मीडिया संस्थानों को क्यों तवज्जो दी जाये जो पत्रकरिता कि आंड में सिर्फ अपनी जेबे भर रहें है ? या फिर ये मान लिया जाए कि प्रेस कार्ड “दलाली का लइसेंस है. जिसके पास प्रेस कार्ड हो वो खुले आम दलाली कर सकता है और एक डिजिटल मीडिया वाला या छोटे मीडिया संस्थान में कार्य करने वाला जब इनके काले कारनामो को उजागर करें तो उसे फर्जी कह कर उसकी आवाज दाब दी जाय?

क्या यही है असली और फर्जी पत्रकार कि पहचान ? नहीं बिलकुल नहीं. हर जगह ईमानदार और भृष्ट भरे पड़े हैं. आज का दौर मीडिया के लिए बहुत ही मुश्किल भरा है. ऐसे में जरुरत है कि जो लोग पत्रकारिता को कर्तब्य मान कर कार्य कर रहे हैं वो एक जुट होकर एक दूसरे का समर्थन करें. और जो लोग प्रेस कार्ड लेकर पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं उनके खिलाफ मुहीम छेड़ें. एक सच्चा पत्रकार होने के लिए जरुरी नहीं कि आपके पास प्रेस कार्ड हो, या आप किसी बड़े मीडिया संस्थान में कार्य करें तभी आप पत्रकार कह लाएंगे.

भारत का हर नागरिक विभिन्न माध्यमों से अपनी बात कह सकता है. डिजिटल मीडिया कि ताकत को पहचानिये और आवाज बुलंद करिये……..

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