प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात एक बार फिर चर्चा में है। यह मुलाकात चीन के तियानजिन शहर में हुई, जहाँ शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक चल रही थी। दुनिया की नजरें पहले से ही इस सम्मेलन पर टिकी थीं, लेकिन जब भारत और रूस के नेताओं के बीच आमने-सामने बातचीत हुई, तो इसने एक नया राजनीतिक संदेश दिया। खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया यूक्रेन युद्ध से परेशान है, वैश्विक अर्थव्यवस्था दबाव में है और देश आपसी रिश्तों को लेकर नए सिरे से सोच रहे हैं।
- मोदी की शांति की अपील: “मानवता की पुकार”
- भारत की संतुलनकारी विदेश नीति
- भारत-रूस संबंधों की गहराई
- इतिहास से आज तक: भरोसे की साझेदारी
- व्यावहारिक सहयोग: रक्षा से लेकर ऊर्जा तक
- एक वैश्विक जिम्मेदारी की भावना
- युद्ध का असर: आम लोगों की परेशानियाँ
- एक जिम्मेदार और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर
- बहुपक्षीय मंचों का प्रभावी इस्तेमाल
- एक मुलाकात, कई संदेश
मोदी की शांति की अपील: “मानवता की पुकार”
इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने जो बात कही, वो सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि उसमें मानवीय संवेदना झलक रही थी। उन्होंने पुतिन से कहा कि “यूक्रेन में शांति का रास्ता खोजना पूरी मानवता की पुकार है।” ये शब्द सुनने में भले साधारण लगें, लेकिन उनका मतलब गहरा है। आज जब दुनिया के कुछ हिस्सों में युद्ध जारी है, निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, बच्चे डर के साये में जी रहे हैं, तो ऐसे में किसी देश का शीर्ष नेता अगर शांति की बात करता है, तो वो आवाज़ औरों तक भी पहुँचती है।
मोदी ने साफ तौर पर यह भी कहा कि संघर्ष को जल्द से जल्द खत्म करने की ज़रूरत है। उन्होंने यह आशा जताई कि सभी पक्ष सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें और स्थायी शांति का रास्ता निकालें।
भारत की संतुलनकारी विदेश नीति
यह संतुलन ही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। एक ओर भारत अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह रूस से अपने पुराने, भरोसेमंद रिश्ते भी बनाए रखे हुए है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं थी। इसमें वह आत्मीयता दिखी, जो दो पुराने सहयोगियों के बीच होती है।
भारत-रूस संबंधों की गहराई
मोदी ने यह भी कहा कि उन्हें पुतिन से मिलना हमेशा एक यादगार अनुभव लगता है। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच लगातार संवाद होता रहता है और कई विषयों पर जानकारी साझा की जाती है। यह भी कहा गया कि भारत में इस साल दिसंबर में होने वाले 23वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन का 140 करोड़ भारतीयों को बेसब्री से इंतजार है। इससे यह संदेश गया कि भारत रूस को एक बहुत खास दोस्त और रणनीतिक साझेदार मानता है।
इतिहास से आज तक: भरोसे की साझेदारी
इतिहास भी यही बताता है कि भारत और रूस (या पहले सोवियत संघ) के रिश्ते हमेशा गहरे और भरोसेमंद रहे हैं। चाहे 1971 का युद्ध हो या भारत की रक्षा ज़रूरतें, रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। यही बात मोदी ने भी दोहराई। उन्होंने कहा कि भारत और रूस ने हमेशा एक-दूसरे का साथ कठिन समय में दिया है। आज जब वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव हो रहे हैं, तो ऐसे में यह सहयोग और भी अहम हो जाता है।
व्यावहारिक सहयोग: रक्षा से लेकर ऊर्जा तक
भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, विज्ञान और शिक्षा जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग है। भारत रूस से तेल भी खरीदता है और कई रक्षा उपकरणों के लिए उस पर निर्भर भी है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए, तब भी भारत ने अपने हितों को देखते हुए रूस से संबंध बनाए रखे। यह एक व्यावहारिक और आत्मनिर्भर विदेश नीति का संकेत है।
एक वैश्विक जिम्मेदारी की भावना
लेकिन इस बार की मुलाकात को सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसमें वैश्विक राजनीति का बड़ा संकेत भी छिपा है। मोदी का “मानवता की पुकार” वाला बयान सीधे-सीधे उन देशों को भी संदेश देता है जो युद्ध को लंबा खींच रहे हैं या उसमें परोक्ष रूप से हिस्सेदार हैं। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह न सिर्फ अपने देश के लिए, बल्कि दुनिया की भलाई के लिए भी जिम्मेदारी निभा रहा है।
युद्ध का असर: आम लोगों की परेशानियाँ
यूक्रेन युद्ध से दुनिया भर में महंगाई बढ़ी है, तेल और गैस के दाम ऊपर गए हैं, खाद्य आपूर्ति पर असर पड़ा है और कई गरीब देशों की हालत खराब हो गई है। भारत जैसे देश, जो खुद विकासशील हैं और गरीबी से लड़ रहे हैं, उनके लिए यह स्थिति और मुश्किलें पैदा करती है। इसलिए भारत की यह शांति की अपील केवल नैतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है।
एक जिम्मेदार और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर
भारत यह भी दिखाना चाहता है कि वह अब सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने वाला जिम्मेदार देश है। शांति की यह मांग भारत की सॉफ्ट पावर को और मजबूत करती है। और जब प्रधानमंत्री मोदी जैसी प्रभावशाली शख्सियत यह बात सीधे पुतिन से कहते हैं, तो उसकी गूंज दूर तक जाती है।
बहुपक्षीय मंचों का प्रभावी इस्तेमाल
इस बैठक से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत बहुपक्षीय मंचों का भरपूर उपयोग कर रहा है। चाहे वह G20 हो, ब्रिक्स हो, या अब SCO, भारत हर मंच पर अपनी आवाज़ मजबूती से उठा रहा है। यह एक आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी भारत की तस्वीर है, जो न किसी के दबाव में आता है, न किसी से डरता है, और न ही अपने पुराने दोस्तों को भूले बिना नए रिश्ते बनाता है।
एक मुलाकात, कई संदेश
भारत और रूस के रिश्ते भले समय के साथ बदलते रहें, लेकिन एक गहराई उसमें बनी हुई है। यह मुलाकात उस रिश्ते की एक और कड़ी है, जिसमें विश्वास है, सहयोग है, और वैश्विक ज़िम्मेदारी का एहसास भी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत शांति स्थापना के प्रयासों में कितना आगे बढ़ता है और क्या वह किसी तरह की मध्यस्थता या संवाद की भूमिका निभा सकता है।
अभी के लिए इतना तय है कि दुनिया को शांति की ज़रूरत है और भारत ने एक बार फिर अपनी भूमिका को रेखांकित किया है, एक शांतिप्रिय, संतुलित और जिम्मेदार देश के रूप में।
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