राबड़ी के बिना अधूरा है इस माता का प्रसाद-आंचलिक ख़बरें-प्रदीप गढ़वाल

News Desk
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झुंझुनू- विविधता से भरे हमारे देश में अनेक त्यौहार बड़े हर्ष और उल्लास से मनाए जाते हैं और हर त्यौहार के पीछे एक कहानी छुपी होती है इन्हीं में से एक है शीतलाष्टमी, होली दहन के आठ दिन बाद मनाई जाती है , अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में इस त्यौहार मनाने का अनोखा तरीका हैं। इसमें खेजड़ी के वृक्ष का पूजन किया जाता है साथ ही बासी खाना अर्थात रात के बचे हुए भोजन को महत्व दिया जाता है.
अष्टमी के दिन ये बासी पकवान देवी को भोग लगाया जाता है। परिवार की महिलाएं पहली रात अनेक पकवान बनाती है । सूर्य की पहली किरण के साथ महिलाएं खेजड़ी के वृक्ष को पानी से नहलाती और बासी भोजन का चढ़ावा चढ़ाती हैं। अपने परिवार को बीमारियों से बचाने की माता से प्रार्थना करती हैं । ऐसी मान्यता है शीतलाष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलता है और लोग प्रसाद स्वरूप बासी खाना खाते हैं। बासी भोजन खाने के कारण इस त्योहार को बसौड़ा या बसियौरा भी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शीतला मां की पूजा-अर्चना और इसमें ठंडा या बासी भोजन करने से संक्रमण एवं अन्य तरह की बीमारियां नहीं होती है।

हर साल यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इसके अगले दिन यानी अष्टमी को बासोड़ा या शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है।सप्तमी के दिन घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। इनमें हलवा, पूरी, दही बड़ा, पकौड़ी, पुए रबड़ी आदि बनाया जाता है। अगले दिन सुबह महिलाएं इन चीजों का भोग शीतला माता को लगाकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस दिन शीतला माता समेत घर के सदस्य भी बासी भोजन ग्रहण करते हैं। इसी वजह से इसे बासौड़ा पर्व भी कहा जाता है।

रोगों से दूर करता है शीतलाष्टमी का व्रत –हिंदू धर्म में देवी पूजा का खास महत्व है तथा शीतला माता हिन्दुओं की प्रमुख देवी है। शीतला माता के बारे में स्कंद पुराण में भी विस्तार से बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता बहुत प्रतापी हैं तथा वह भक्तों को रोगों से दूर करती हैं। वैसे तो शीतला माता सभी प्रकार के रोग-शोक को दूर कर भक्तों को सुख प्रदान करती हैं लेकिन चेचक जैसे रोगों को मुक्ति दिलाने में उनकी विशेष कृपा है। मां शीतला देवी के स्वरूप विशेष प्रकार है। देवी अपने हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते लिए हुए गदर्भ पर सवार दिखाई देती हैं। शीतला माता के साथ कुछ अन्य देवी-देवता भी मौजूद होते हैं उनमें ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, चौंसठ रोग, हैजे की देवी, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी प्रमुख हैं।

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