Raja Devi Baksh Singh: ने अंग्रेजों के सामने घुटने नही टेके
Raja Devi Baksh Singh, गोंडा,उत्तर प्रदेश के एक ब्रिटिश काल के राजा थे । उनका जन्म 19वीं शताब्दी ई. में हुआ था। वे 1857 के विद्रोह के कारण लोकप्रिय हुए। उन्हें सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में जाना जाता है, उनका नाम और उनके द्वारा किए गए कार्यों का आज भी बहुत सम्मान है। आज बहुत कम लोग हैं जो उनका नाम जानते हैं
उन्होंने1857 के विद्रोह में वीरता और बहादुरी का प्रदर्शन किया और यहां तक कि हिंदू और मुस्लिम के बीच सद्भाव को प्रोत्साहित किया ।आज भी लोगों की जुबां पर राजा की शौर्य गाथा है ,(अस्सी चार चौरासी कोस मां जेह कै डंका बाजि रहे) की लाइनें गोंडा नरेश Raja Devi Baksh Singh की शौर्यगाथा का बखान करने के लिए काफी है। उन्होंने अंग्रेजों से सीधी लड़ाई लड़ी।
ब्रिटिश हुकूमत के आगे न तो उन्होंने समर्पण किया न ही हार मानी। राजा से जुड़े स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार है 1857 वीं की क्रांति के महानायक Raja Devi Baksh Singh की रियासत कोट बनकसिया, राजगढ़ व जिगना में थी। उनका पूरा परिवार जिगना कोट में ही रहता था। राजा को मल्लयुद्ध, घुड़सवारी, तैराकी में दक्षता हासिल थी।
लखनऊ में नवाब वाजिद अली शाह के सामने राजा ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया था। ब्रिटिश हुकूमत ने राजा को कई प्रस्ताव भेजे लेकिन उन्होंने से अस्वीकार कर दिया। नवाबगंज के पास लगती लोलपुर का ऐतिहासिक मैदान महाराजा देवी बख्श सिंह के आन-बान व शान का जीता जागता सबूत है। जब उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी नही स्वीकारी तो अंग्रेज हुकूमत ने उन्हें कमजोर करने के लिए पड़ोसी राजाओं को बढ़ावा देना शुरू कर दिया।
उन्हीं के उकसाने पर Raja Devi Baksh Singh के राज्य पर हमला भी किया गया। कानपुर से लेकर नेपाल सीमा तक कड़ी टक्कर देने वाली राजा की सेना ने इस बार भी उतनी ही वीरता से मुकाबला किया। बहादुर सेना को सात दिनों तक भूखे रहकर युद्ध करना पड़ा गोंडा नरेश ने अंग्रेजों के सामने घुटने नही टेके और अपने वफादार सैनिकों को लेकर नेपाल चले गए। अवध का सबसे अंतिम जिला गोंड़ा ही है, जिस पर सबसे अंत में अंग्रेजों ने कब्जा किया।
धानेपुर से 20 किलोमीटर दूर मुजेहना ब्लाक में स्थित जिगना बाजार में उनका पैतृक महल खंडहर के रूप में आज भी है। बुजुर्ग बताते हैं कि महल में एक लाख ताख बने थे,जिस पर दीपावली के दिन दिये जलाये जाते थे। आज यह उपेक्षा का शिकार है। भवन जर्जर हो चुका है। दीवारों पर जंगली घासें उगी हैं। जिगना बाजार में मंदिर व महल अपनी पहचान खोते जा रहे हैं लेकिन, प्रशासन इस ओर ध्यान नही दे रहा है।
Raja Devi Baksh Singh से जुड़ी स्मृतियों को संजोने का प्रयास सरकार को करना चाहिए ,कई बार अधिकारियों को पत्र लिखा गया ,लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं,अगर ऐसा ही हमारे देश के वीर महापुरुषों की स्मृतियों को अनदेखा किया गया, तो हमारी आने वाली नस्लें भारत के शूरवीरों के बारे में कुछ खास नहीं जान पाएगी, ऐसे बहुत से राजा हुए हैं, जिनका इतिहास अभी भी बहुत से लोगों को पता नहीं है।
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