रूस ने छोड़ा न्यूक्लियर संधि का साथ: अमेरिका से टकराव, दुनिया पर मंडराया नया परमाणु संकट

Aanchalik Khabre
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न्यूक्लियर

एक बार फिर न्यूक्लियर हथियारों की होड़?

रूस ने अब आधिकारिक तौर पर यह ऐलान कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ हुई INF Treaty (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty) के तहत अपनाई गईं पाबंदियों को नहीं मानेगा। इस फैसले ने अमेरिका-रूस के बीच तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है और एक नई न्यूक्लियर रेस की आशंका पैदा कर दी है।

आइए जानते हैं कि इस फैसले के पीछे की वजहें क्या हैं, इससे कौन-कौन प्रभावित होगा, और भारत की इसमें क्या भूमिका है।

INF संधि क्या थी और क्यों थी अहम?

1987 की ऐतिहासिक संधि
INF संधि 1987 में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच हुई थी। इसका मकसद था 500 से 5,500 किलोमीटर दूरी तक मार करने वाली न्यूक्लियर मिसाइलों को खत्म करना।

यूरोप को राहत
इस संधि के चलते यूरोप में तैनात हजारों खतरनाक मिसाइलें हटाई गईं, जिससे न्यूक्लियर युद्ध की संभावना बेहद कम हो गई थी।

रूस ने अब क्यों छोड़ी संधि?

अमेरिका पर आरोप
रूस के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि वह अब खुद पर लगाई गईं मिसाइल तैनाती की पाबंदियों को नहीं मानेगा। रूस का आरोप है कि अमेरिका ने एशिया और यूरोप में खुद ही इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलें तैनात कर दी हैं।

“संयम की भावना” का उल्लंघन
रूस का कहना है कि अमेरिकी परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती और बढ़ते सैन्य अभ्यास “संयुक्त संयम” की भावना के खिलाफ हैं।

कौन हैं सबसे ज्यादा खतरे में?

यूरोप के देश
INF संधि से बाहर निकलते ही रूस उन मिसाइलों को तैनात कर सकता है जिनकी रेंज यूरोप को सीधे निशाना बनाती है। इससे जर्मनी, पोलैंड, फ्रांस जैसे NATO सदस्य सबसे ज्यादा खतरे में हैं।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र
फिलिपींस जैसे देश, जहां अमेरिका मिसाइलें तैनात करने की योजना बना रहा है, रूस की नजर में खतरे की घंटी हैं। इससे पूरे एशिया में तनाव बढ़ सकता है।

अमेरिका-रूस टकराव की जड़ें क्या हैं?

ट्रंप का नया अल्टीमेटम
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले हफ्ते रूस पर नई सख्त पाबंदियां लगाईं और 8 अगस्त तक यूक्रेन में संघर्ष रोकने का अल्टीमेटम दे दिया।

परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती
ट्रंप ने दो अमेरिकी परमाणु पनडुब्बियों को “कॉम्बैट रेडी” घोषित किया, जिससे रूस में गहरी नाराजगी फैल गई।

भारत पर क्या असर?

अमेरिकी नाराजगी
भारत अब भी रूस से सस्ती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहा है, जिसे लेकर अमेरिका ने नाराजगी जताई है। हाल ही में अमेरिकी सरकार ने भारत के उत्पादों पर 25% टैरिफ लगा दिया है।

भारत का विरोध
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि अमेरिका की ये नीतियां “अनुचित और एकतरफा” हैं। भारत ने “वैश्विक संतुलन” की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि सभी देशों को समान अधिकार मिलने चाहिए — चाहे वह ऊर्जा सुरक्षा हो या रक्षा सहयोग।

रूस से तेल खरीदने वाले शीर्ष देश
देश अनुमानित खरीद (USD में)
चीन $219.5 बिलियन
भारत $133.4 बिलियन
तुर्की $90.3 बिलियन

भारत पहले रूस से 1% से भी कम तेल खरीदता था, लेकिन अब उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 35–40% हो गई है।

क्या फिर से शुरू हो गई है नई शीत युद्ध?
हथियारों की दौड़ दोबारा शुरू?
रूस की नई घोषणा और अमेरिका की जवाबी रणनीति इस ओर इशारा कर रही हैं कि दुनिया एक बार फिर “परमाणु संतुलन” की ओर लौट रही है, जिसमें शांति की जगह डर और शक्ति की भाषा बोलेगी।

कूटनीति की जगह मिसाइलें?

विशेषज्ञों का कहना है कि INF जैसी संधियों के बिना अब युद्ध की संभावना बढ़ गई है। अमेरिका और रूस के बीच संवाद की सीधी लाइनें भी कमजोर हो चुकी हैं।

आगे क्या हो सकता है?
ट्रंप की 8 अगस्त की डेडलाइन
अब सबकी नजरें 8 अगस्त पर टिकी हैं जब रूस को अमेरिका की शांति की पेशकश का जवाब देना है। अगर यह प्रस्ताव खारिज होता है, तो यूक्रेन युद्ध और भी खतरनाक रूप ले सकता है।

भारत और चीन की स्थिति

भारत और चीन दोनों वैश्विक शक्ति संतुलन में अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन उनके लिए यह संतुलन बनाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है, खासकर जब वे अमेरिका और रूस — दोनों से ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग रखते हैं।

निष्कर्ष: क्या फिर हथियारों के बल पर तय होगा भविष्य?
रूस का INF Treaty से बाहर निकलना सिर्फ एक रणनीतिक फैसला नहीं, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है। जहां एक ओर अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए सख्त होता जा रहा है, वहीं रूस भी पीछे हटने को तैयार नहीं।

भारत जैसे देशों के लिए यह एक कठिन समय है, जहां उन्हें संतुलन साधते हुए अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करनी होगी।

अब सवाल यह है: क्या दुनिया फिर से न्यूक्लियर हथियारों की दौड़ में फंस रही है, या इस बार कोई नया रास्ता निकलेगा?

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