ऑल इंडिया लीगल एड फोरम ने कहा, नरेन्द्र मोदी सरकार को आईएनए और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित गोपनीय फाइलों को डीक्लासीफाई कर देना चाहिए-आंचलिक ख़बरें-शहज़ाद अहमद

News Desk
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ऑल इंडिया लीगल एड फोरम ने कहा, नरेन्द्र मोदी सरकार को आईएनए और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित गोपनीय फाइलों को डीक्लासीफाई कर देना चाहिए

शहज़ाद अहमद /नई दिल्ली

दि ऑल इंडिया लीगल एड फोरम ने आज यहां कांस्टीट्यूशन क्लब में अपना नेशनल कांफ्रेंस आयोजित किया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज के 75 साल पूरे होने पर आयोजित समारोह के समापन की घोषणा की। इस मौके पर फोरम ने अपनी आठ मांगें रखीं। इनमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित गोपनीय फाइलों को डीक्लासीफाई करना शामिल है। इसके अलावा, आईएनए के सजाने से संबंधित सच को जितनी जल्दी संभव हो सामने लाने की मांग की गई है ताकि वास्तविक सच्चाई सबको मालूम हो। दि ऑल इंडिया लीगल एड फोरम इस क्षेत्र में काम करता रहा है और सुभाष चंद बोस के लापता होने से संबंधित जानकारी चाहता है। इस संबंध में यह पिछले 15 वर्षों से केंद्र सरकार से मांग कर रहा है कि सभी फाइलों को डीक्लासीफाई किया जाए। फोरम का मानना है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार को चाहिए कि वह रूस की सरकार को चिट्ठी लिखकर मांग करे कि बोस के निधन से संबंधित केजीबी की फाइल का खुलासा करे। यह मौत रूस के ओम्स शहर में स्थित साइबेरिया जेल में हुई थी। ऑल इंडिया लीगल फोरम के महासचिव जयदीप मुखर्जी ने कहा, “हमारे लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में आजादी के बाद कुछ राजनीतिक साजिश के चलते भारत की आजादी के संघर्ष में आजाद हिन्द फौज के योगदान को लोगों की नजरों में बेहद तकनीकी ढंग से दबा दिया गया था और सच तो यह है कि आजाद हिन्द फौज के कम से कम 25,000 सैनिकों ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी जान दी।” बोस ने 1943 में सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज सरकार का गठन किया था और उस सरकार को दुनिया के कुछ देशों ने मान्यता दी थी और वह सरकार भारत की पहली प्रांतीय (प्रोविंसियल) सरकार थी जिसकी स्थापना विदेश में हुई थी और वे उस सरकार के कमांडर इन चीफ थे। मुखर्जी ने आगे कहा, “यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 1947 में आजादी के बाद उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इतिहासकार, प्रोतुल गुप्ता को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में आजाद हिन्द फौज के योगदान पर एक किताब लिखने के लिए कहा। 1950 में इतिहासकार प्रोतुल गुप्ता ने पुस्तक की एक पांडुलिपि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पास जमा कराई थी पर जवाहर लाल नेहरू ने उस पुस्तक को प्रकाशित होने से मना कर दिया। और उक्त पांडुलिपि को भारतीय सेना के रक्षा अकादमी में वर्गीकृत (गुप्त) दस्तावेज के रूप में रखवा दिया। इतिहासकार प्रोतुल गुप्ता की उक्त पुस्तक आज तक डीक्लासीफाई नहीं हुई है।”

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