ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप तथा वीर्य आचार का पालन करने वाला श्रेष्ठ श्रमण होता है-आँचलिक ख़बरें-राजेंद्र राठौर

News Desk
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-प्रवर्तक पुज्य जिनेन्द्र मुनिजी म.सा.।
आत्मो्द्धार वर्षावास के अन्त‍र्गत दिनांक 11 अक्टोेम्बर को धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक पुज्य् जिनेन्द्र मुनिजी ने भगवान महावीर स्वामीजी की अन्तिम वाणी ‘उतराध्ययन सुत्र’ के 17वे, 18वे अध्याय के बारे में सार स्वरूप बताया।
17वॉ अध्याय ,पापी श्रमण * :- इस अध्याय में पापी श्रमण की चर्या एवं उनके लक्षणो के बारे में बताया गया है। संयम पालन के 5आचार बताए गए हे, ज्ञानाचार , दर्शनाचार, चारित्राचार्, वीर्याचार तथा तपाचार। जो श्रमण इनका पालन नहीं करता है, वह पापी श्रमण कहलाता है। साधना में ढीला, पापी श्रमण कहलाता है। अध्याय की 1 से 4 गाथा में पापी श्रमण ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा तप आदि में शिथिल क्यों बनता है, बताया गया है। जो शिष्य गुरू से कहे कि मुझे रहने को बढिया मकान मिला है, आहार-पानी मिल जाता हे, फिर आप मुझे ज्ञान सिखने का क्यों कहते हो? विशेष ज्ञान प्राप्ति करके मैं क्या करूँगा? वह पापी श्रमण कहलाता है। वह ज्ञान ध्यान में शिथिल बन जाता है। वेश परिवर्तन से नहीं मन परिवर्तन से आत्मा का कल्याण होता है। आपने आगे बताया कि जो रात्रि में अधिक देर तक सोता है, आहार लेकर दिन में भी सो जाता है, जिन गुरू आचार्य से ज्ञान सीखा उन्हीं की निंदा करने वाला पापी श्रमण कहलाता है। गुरू की सेवा नहीं करना, आदर भक्ति नहीं करना, घमंड करना वह पापी श्रमण कहलाता है। बराबर देख कर नहीं चलता, हरी तथा पानी पर चलना, जीवों के उपर चलने वाला तथा असंयम की क्रिया करता है, वह पापी श्रमण है। जो बिछौना, वस्त्रआदि का प्रमार्जन नहीं करता है, प्रतिलेखन में प्रमाद करता है, गुरू के सामने बोलता है, मर्यादा का उल्लघंन करता है, क्रोध करता हे, वाद-विवाद करता है, आहार का संविभाग नहीं करता है, विहार से आने पर पैरो का प्रतिलेखन नहीं करता है, आसन पर स्थिरता से नहीं बैठता है, जो दुध, दही आदि भोज्य पदार्थो का बार-बार आहार करता है, तपस्या नहीं करता है, गुरू के समझाने पर उल्टा उपदेश देता है, वह पापी श्रमण कहलाता है। आपने आगे बताया कि जो अपने आचार्य, गुरू से बिना पुछे उनको छोड़कर दुसरे धर्म-सम्प्रदायो के गुरूओं जहॉ सम्मान मिले वहॉ चला जाता है, वहॉ से फिर अन्य संप्रदाय में चला जाता है, गण बदलता है, वह पापी श्रमण कहलाता है। जो अपने रिश्तेदारों के घर पर ही बैठ कर आहार ग्रहण कर लेता है, जो भुत, वर्तमान, भविष्य की जानकारी दुसरो बताता है, गृहस्थी के प्रपंच में फंस जाता है वह पापी श्रमण कहलाता है। इस प्रकार के कृत्य करने वाला निन्दनीय होता है, इस लोक तथा परलोक में भी निन्दनीय होता है। वह आराधक नहीं होता है। जो श्रमण इन दोषो का सदा वर्जन करता है, वह सभी मुनियों में अमृत के समान पूज्यनीय होता है। वह इस लोक तथा परलोक का श्रेष्ठ आराधक होता है।WhatsApp Image 2022 10 11 at 6.32.02 PM
18वॉं अध्याय:_ संजयीय- इस अध्याय में बताया गया है कि काम्पिलय नगर में संजय नामक राजा शिकार का शौकिन था। एक बार वह सैनिकों के साथ शिकार करने जंगल में जाता है, हिरण का शिकार करता है। जंगल में एक मुनि ध्यान कर रहे थे, शिकार करने पर हिरण मुनिजी के पास गिर जाता है। मुनि को देख कर राजा भी डर के मारे घबरा जाता है, वह माफी मांगता है। मुनि राजा को अभयदान देते है तथा राजा को सभी जीवों को भी अभयदान देने का उपदेश देते है। राजा उपदेश सुन कर दीक्षा अंगीकार कर लेता है। संजय मुनि बने। विचरण करते रहे। एक बार क्षत्रिय राजर्षि ने संजय मुनि के ज्ञान,दर्शन चरित्र की परीक्षा लेने के लिए उनसे प्रश्न पूछे। आपका नाम, गौत्र क्या है? किस लिए मुनि बने ?किन किन गुरू की सेवा करते हो,? विनीत कैसे कहलाते हो? संजय मुनि ने नाम बताया, गौतम गौत्र बताई, मुक्ति प्राप्ति के लिए मुनि बना हॅू, आचार्य गर्दभाली की सेवा करता हॅू, उनके आदेश का पालन करता हॅू, यही मेरी विनीतता है। जिन शासन जयवंत है। दोनो सिद्ध गति को प्राप्त करते है।
सदगुरु तिराने वाले होते हे, उनकी संगति आवश्यक है ।
-पुज्य संयत मुनि जी म.सा.।
धर्मसभा में अणुवत्स पूज्य संयत मुनि जी म.सा. ने कहा ‍कि नाव तिराती भी है, तथा डुबाती भी है। सद्गुरू तिराते हे, डूबाते नहीं है। कुगुरू डुबाते है, खुद भी डुबते है। सदगुरू की संगति आवश्यक है। सद्गुरू हमें सही रास्ता दिखाते है। ऐसे ही सद्गुरू आचार्य पुज्य ‘माधवमुनि जी’ म.सा. थे। उनको पालक गुरू मगन मुनिजी ने सही रास्ता दिखाया था। उनको शास्त्रों का ज्ञान सिखाया। अन्य पंथ के शास्त्र भी पढाए। उनके गुरू मगन मुनि का मंडावर में चातुर्मास था,स्वास्थ्य खराब था। माधव मुनि जी गुरु के स्वास्थ्य खराब का समाचार सुनकर विहार कर रहे थे तब रास्ते में उनके पैर का अंगूठा सुज गया था । उनको लगा की गुरु तकलीफ में हे । उनके पहूंचने के पहले ही मगन मुनि जी का देहावसान हो गया। पहले गुरू मेघमुनि जी तथा दूसरे गुरू मगन मुनिजी का देहावसान एक ही गांव , एक ही मकान, एक ही माह, एक ही तिथि, एक ही समय पर हुआ, यह संयोग था। पुज्य नंदलालजी म.सा. के सानिध्य में आए, उनको युवाचार्य बनाया गया, उनके जीवन की कई घटनाओ के बारे में आपने बताया । संस्कृत के श्लोक एक मंडप में गलत लिखे थे, उनको सही किया, खुले मॅुह बोलने का मना करते थे। कुंडली के माध्यम से उनकी परीक्षा ली गई थी। जानवर की कुंडली बता कर परीक्षक के झूठ का पर्दाफाश किया था। 53 वर्ष की उम्र में कालधर्म हुआ। वे जैन शासन के कौहिनूर हीरे के समान थे। उन्होंने जैन धर्म की बहुत प्रभावना की थी। उनको सो साधु, एक माधू कहते थे । पूरे प्रवचन का लेखन सुभाष चन्द्र ललवानी द्वारा किया गया ।सभा का संचालन श्री प्रदीप जी रूनवाल ने किया।

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