राजेंद्र राठौर
जैसे मैंने किया वैसे हि तुम भी किया करो…..
प्रभु येसु के ब्यालू अर्थात् उनके अन्तिम भोज के स्मरणोत्सव को आज मनाया जाता हैं। ऐसा पावन दिन वर्ष में केवल एक ही बार आता है। सम्पूर्ण विश्व में आज केथोलिक कलिसीया पुण्य बृहस्पतिवार का पर्व मना रही हैं।
अपने शिष्यों के साथ, लगभग दो हजार वर्ष पूर्व प्रभु येसु ने अंतिम भोज किया और पवित्र यूखरिस्त की स्थापना की। आज हम उसी अंतिम भोज का स्मरणोत्सव मना रहें हैं। प्रभु येसु ने अंतिम भोज में पिता परमेश्वर को अपना शरीर एवं लहु अर्पित किया था और दाखरस एवं रोटी के रूप में अपना शरीर व लहु को, अपने शिष्यों के उपभोग के लिए दिया। इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों और उनके उत्ताराधिकारियों को दाखरस और रोटी के रूप में अपने शरीर और लहु को बलिदान स्वरूप चढ़ाने का आदेश भी दिया। इसी कारण आज का दिन स्नेह दिवस पुरोहिताई एवं यूखारिस्त की स्थापना दिवस के नाम से जाना जाता है।
आज के पूजन विधि के मुख्य याजक फादर प्रताप बारिया एवं प्रवाचक फादर रॉकी शाह रहे।
आज के पूजन समारोह के तीन भाग होते हैं- 1. शब्द समारोह 2. पैरों को धोना (अर्थत सेवा भाव) और 3. यूखारिरतीय जलूस आज के समारोह में महिमागान गाया जाता हैं, घंटियाँ बजायी जाती हैं और महिमागान की समाप्ति के बाद पास्का जागरण तक घंटियाँ शांत रहती हैं। पैरों की धुलाई खीस्त के प्रेम और सेवाभाव को दर्षाता है, जो कि सेवा करने न की सेवा कराने आये थे।
परमप्रसाद के वितरण के बाद की प्रार्थना के समाप्ति के पश्चात् यूखरिस्तीय जलूस में, पवित्र परमप्रसाद को एक अन्य वेदी पर रखा जाता है जिसे विश्राम की वेदी ( Altar of Repose) कहा जाता है। आज के पूजन समारोह के अन्त में हमारा ध्यान प्रभु येसु के दुःख भोग पर केंद्रित करने के लिए वेदी से सभी प्रकार की साज समाग्री और वस्तुओं को हटा दिया जाता हैं।
प्रवचन के बाद पुरोहित, बारह व्यक्तियों के पैरो को धोते हैं जिस प्रकार प्रभु येसु खीस्त ने अपने बारह
शिष्यों के पैर धोये थे। मुख्य याजक प्रभु येसु के प्रतिरूप एवं हमारे प्रतिनिधि है। यह समारोह प्रभु में
विश्वास एवं पडोसी सेवाभाव में जीने की हमारी बुलाहट की याद दिलाता है। यूखरीस्तीय प्रार्थना के पश्चात् पवित्र यूखरीस्त की स्थापना के बाद प्रभु येसु ने अपने शिष्यों को अंतिम उपदेष दिये जिसके बाद गेथसेमनी नामक बारी में, प्रार्थना करने और अपने आपको दुःख भोग के लिए परमेश्वर को अर्पित किया।
परमप्रसाद को दूसरे वेदी पर रखा जाता हैं, जहाँ हम सब उसकी आराधना करते हैं। यहाँ पर प्रभु
के क्रूस पर उनके पवित्र मरण से पहले उनकी घोर यन्त्रणा एवं उनके एकाकीपन में, उनका साथ देने और प्रार्थना करने के लिए, हम बुलाये जाते हैं।
संगीत दल ने अपने मधुर गीतो के द्वारा पुजन विधि को और भी भक्तिमय बना दिया