राजेंद्र राठौर
समलैंगिकता को बढ़ावा और मान्यता देना यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है, षड्यंत्र करने वालों का सोचना है कि भारत से विवाह नामक संस्था को खत्म कर दि जाएगी तो भारतीय संस्कृति अपने आप खत्म हो जाएगी। किरण शर्मा
महिला संगठनों ने कलेक्टर को अनुरोध पत्र सौंपा
झाबुआ, नारी शक्तियों ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शीघ्रता एवं आतुरता में समलैंगिक व्यक्तियों के विवाह को मान्यता न देने हेतु महिला संगठनों द्वारा अंबेडकर पार्क में एकत्रीकरण के बाद नारे लगाते हुए रैली के रूप में कलेक्टर कार्यालय पहुंची। यहां एसडीएम के समक्ष शैलू बाबेल ने अनुरोध पत्र का वाचन किया उसके बाद कलेक्टर सुश्री तनी हुड्डा को अनुरोध पत्र सौंपा।
अनुरोध पत्र में कहा गया कि भारत देश आज सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों की अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब विषयांतर्गत विषय को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनने एवं निर्णीत करने की कोई गंभीर आवश्यकता नहीं है। देश के नागरिकों की बुनियादी समस्याओं जैसे गरीबी उन्मूलन, निशुल्क शिक्षा का क्रियान्वयन, प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का अधिकार, जनसंख्या नियंत्रण की समस्या देश की पूरी आबादी को प्रवाहित कर रही है, उक्त गंभीर समस्याओं के संबंध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ना तो कोई तत्परता दिखाई गई ना ही कोई न्यायिक सक्रियता दिखाई है।
भारत विभिन्न धर्मों जातियों उप जातियों का देश है इसमें शताब्दियों से केवल जैविक पुरुष एवं जैविक महिला के मध्य विवाह को मान्यता दी है। विवाह न केवल 2 विषम लेंगीको का मिलन है बल्कि मानव जाति की उन्नति भी है। “विवाह” शब्द को विभिन्न नियमों अधिनियमो लेखों एवं लिपियों में परिभाषित किया गया है। सभी धर्मों में केवल विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के विवाह का उल्लेख है। विवाह को दो अलग लेंगीको के पवित्र मिलन के रूप में मान्यता देते हुए भारत का समाज विकसित हुआ है, पाश्चात्य देशों में लोकप्रिय, दो पक्षों के मध्य अनुबंध या सहमति को मान्यता नहीं दी है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नालसा (2014) नवतेज जोहर (2018) के मामलों में समलैंगिकता विपरीत लिंगी के अधिकारों को पूर्व से ही संरक्षित किया है । जिससे यह समुदाय पूरी तरह से उत्पीड़ित या असमान नहीं है जैसा कि उनके द्वारा बताया जा रहा है। इसके विपरीत भारत की अन्य पिछड़ी जातियां आज भी जातिगत आधार पर शोषित और वंचित हो रही हैं, जो आज भी अपने अधिकार के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को अपने पक्ष में होने का इंतजार कर रही है। ऐसी स्थिति में समान लेंगीको के विवाह को विधि मान्यता दिए जाने की मांग उनका मौलिक अधिकार न होकर वैधानिक अधिकार हो सकता है, जो केवल भारत की संसद द्वारा कानून बनाकर ही संरक्षित किया जा सकता है।

विधायिका ने पहले ही उपरोक्त निर्णय के आधार पर कार्रवाई कर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 2019 को अधिनियमित किया है और इसलिए इस समुदाय कि यह आशंका या कथन कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें मूल अधिकार प्रदान नहीं किए गए हैं सर्वथा गलत है। ऐसे हर एक व्यक्ति के अधिकार की देखभाल/संरक्षण विधायिका द्वारा किया जा रहा है। उक्त अधिनियम के अधिनियमित हो जाने पर उक्त कथित समुदाय के व्यक्तियों को यह दावा/मांग करने का मौलिक अधिकार नहीं है कि उनके विवाह को विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत पंजीकृत एवं मान्यता प्राप्त की जावे।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस समुदाय विशेष द्वारा विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत अधिकार बनाने की मांग की जा रही है जबकि उक्त अधिनियम मात्र जैविक पुरुष और महिला पर लागू होता है इसलिए किसी भी प्रावधान को हटाने/ बढ़ाने का कोई भी प्रयास अथवा उक्त अधिनियम (प्रावधान) को नए तरीके से परिभाषित करना, उसे नए स्वरूप में लिखना निश्चित एवं स्पष्ट रूप से विधायिका से कानून बनाने की शक्ति ले लेना माना जाएगा।
विवाह एक सामाजिक कानूनी संस्था है, जिसे भारत के संविधान में अनुच्छेद 246 के अंतर्गत सक्षम विधायिका द्वारा शक्ति का प्रयोग कर बनाया है, उसे कानूनी रूप से मान्यता प्रदान की और विनियमित किया गया। विवाह जैसे मानवीय संबंधों की मान्यता अनिवार्य रूप से विधायकी कार्य है। न्यायालय विवाह नामक संस्था को न्यायालयीन व्याख्या विधायिका द्वारा दिए गए विवाह संस्था के मूर्त स्वरूप को ना तो नष्ट कर सकती है ना ही नवीन स्वरूप बना सकती है और ना ही मान्यता दे सकती है।

भारत में विवाह का एक सभ्यतागत महत्व है और एक महान और समय की कसौटी पर खरी उतरी है वैवाहिक संस्था को कमजोर करने की किसी भी प्रयास का समाज द्वारा मुखर होकर विरोध किया जाना चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक सभ्यता पर सदियों से निरंतर आघात हो रहे हैं फिर भी अनेक बाधाओं के बाद भी वह बची हुई है। अब स्वतंत्र भारत में इसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर पश्चिमी विचारों दर्शनों एवं प्रथाओं के अधीरोपण का सामना करना पड़ रहा है, जो इस राष्ट्र के लिए व्यावहारिक नहीं है।
हम इस महत्वपूर्ण विषय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिखाई जा रही आतुरता पर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त करते हैं न्याय की स्थापना एवं न्याय तक पहुंचने के मार्ग को सुनिश्चित करने तथा न्यायपालिका की विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए लंबित मामलों को पूरा करने एवं महत्वपूर्ण सुधार करने के स्थान पर एक काल्पनिक मुद्दे पर न्यायालयीन समय एवं बुनियादी ढांचे को नष्ट/ उपयोग किया जा रहा है जो सर्वथा अनुचित है।
हम सविनय निवेदन करते हैं कि आप उक्त विषय पर सभी हितबध व्यक्तियों /संस्थाओं से परामर्श करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं और यह सुनिश्चित करने का प्रयास करें कि समलैंगिक विवाह न्यायपालिका द्वारा वेद घोषित नहीं किया जावे क्योंकि उक्त विषय पूर्ण रूप से विधायिका के क्षेत्राधिकार में आता है।
महिला संगठन द्वारा अनुरोध पत्र सौपते समय निमा समाज, सोनी समाज, राजपूत समाज, ब्राह्मण समाज, गवली समाज, जैन समाज, मुस्लिम समाज, ईसाई समाज, राठौर समाज, भावसार समाज, सांत्वना ग्रुप, संकल्प ग्रुप, हनुमान टेकरी सेवा समिति, गुड मॉर्निंग क्लब, इनरव्हील क्लब, इनरव्हील शक्ति, पालीवाल समाज, माहेश्वरी समाज, बोहरा समाज, सामाजिक महासंघ, व्यापारी संघ, सफाई कर्मी, सिंधी समाज, कायस्थ समाज, नवदुर्गा समिति हाउसिंग बोर्ड, पतंजलि योग समिति, गायत्री शक्तिपीठ, रोटरी क्लब, पेंशनर एसोसिएशन, वैश्य समाज, जैन सोशल ग्रुप, माली समाज, व अन्य समाज की महिलाएं उपस्थित थी।