डीपी यादव के चुनाव लडने से सपा, बसपा और भाजपा के बिगड़े समीकरण-आंचलिक ख़बरें-शम्स उददीन

News Desk
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सपा को अपना अभेद्य दुर्ग में साख बचाना बना चुनौती
बसपा, भाजपा का अभी तक नहीं खुला है खाता

सहसबान,(बदायूं)–: 70 सालों से बंजर पड़े सहसवान विधानसभा क्षेत्र में भाजपा इस बार कमल खिलाने की जुगत में एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। मगर डी पी यादव के सहसवान सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा ने भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। समाजवादी पार्टी में भी खलबली मची हुई है सपा से छह बार के विधायक ओंकार सिंह यादव पूरे दमखम के साथ जनसंपर्क में जुटे हुए हैं मगर इस बार के चुनाव में सपा की अभेद्य दुर्ग कहीं जाने वाली सहसवान सीट पर सपा का परचम लहराना लोहे के चने चबवाने के समान होगा। इस बार का चुनावी मुकाबला डी पी यादव , सपा प्रत्याशी और बसपा प्रत्याशी के बीच होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में डीपी यादव जेल में होने के कारण चुनाव नहीं लड़े थे उनकी पत्नी उमलेश यादव ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और 57522 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रही। बसपा प्रत्याशी अरशद अली 73 274 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे जबकि सपा प्रत्याशी ओंकार सिंह यादव ने 77 543 वोट पाकर जीत हासिल की थी। और भाजपा प्रत्याशी आशुतोष वार्ष्णेय 25000 से कम वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे थे वर्ष 2007 के चुनाव में डी पी यादव ने अपनी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाकर चुनाव लड़ा और पांच बार के विधायक ओंकार सिंह यादव को कड़ी टक्कर देते हुए मात्र 109 वोटों से पटनी देते हुए जीत का परचम लहराया था।

इस बार के चुनाव में भी डी पी यादव का सपा प्रत्याशी और बसपा प्रत्याशी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होने की प्रबल संभावना है। सहसवान सीट की खासियत रही है यहां की जनता ने स्थानीय नेताओं के वजाय बाहरी प्रत्याशियों को जिताने में जायदा दिलचस्पी ली है यही कारण है कि वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 2017 तक हुए चुनाव में एक दो बार को छोड़कर बाहरी लोगों को ही चुनाव जीता कर विधायक बनाया है बाहरी चुनाव जीतने वालों में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव, शांति देवी यादव, नरेश पाल सिंह यादव, डी पी यादव और ओंकार सिंह यादव आदि शामिल है भाजपा ने केवल एक बार वर्ष 1996 में मुलायम सिंह यादव की टक्कर पर दहगंवा निवासी महेश चंद गुप्ता को प्रत्याशी बनाया था। और पराजय का मुंह देखना पड़ा। चुनाव हारने के बाद महेश चंद गुप्ता ने भाजपा में अपनी पकड़ मजबूत बना ली वह वर्ष 2017 में बदायूं सदर सीट से विधायक चुने गए और योगी सरकार में मंत्री बने।

इस बार भी सहसवान से भाजपा के टिकट की दावेदारी में स्थानीय लोगों के नाम नहीं दिख रहे हैं गुन्नौर के विधायक अजीत कुमार सिंह के भाई दीपक यादव, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम यादव, और पूर्व युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेश यादव के नाम टिकट की चर्चा में है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सहसवान आने का मकसद भी यही था कि इस बार सपा के इस अभेद्य दुर्ग को भेदा जाये। डीपी यादव के चुनाव लड़ने की घोषणा से भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। वर्ष 2017 के चुनाव में जनपद की 6 सीटों में से पांच पर भाजपा का कब्जा था और सहसवान सपा के कब्जे में थी। अभी तक सहसवान से बसपा ने अरशद अली को ही उम्मीदवार बनाया है और डी पी यादव ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है सपा से ओंकार सिंह यादव का टिकट पक्का माना जा रहा है जबकि कांग्रेश और भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं सहसवान सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होने की प्रबल संभावना बनी हुई है सहसवान का चुनाव विकास को दरकिनार कर जातिगत आंकड़ों के आधार पर डाला जाता है इस चुनाव में 425834 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

जिसमें 227675 पुरुष मतदाता और 198159 महिला मतदाता है जबकि इस बार 73369 नये मतदाताओं को शामिल किया गया है जो पहली बार चुनाव में मतदान करेंगे । वर्ष 2017 के चुनाव में मतदाताओं की कुल संख्या 352465 थी। जातिगत आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो क्षेत्र में यादव मतदाता अठारह प्रतिशत और मुस्लिम मतदाता बीस प्रतिशत के लगभग है इसके बाद बड़ी संख्या में एससी मतदाता चौदह प्रतिशत है वैश्य और मौर्य शाक्य मतदाताओं की संख्या लगभग आठ आठ प्रतिशत है ब्राह्मण और ठाकुर भी लगभग छह छह प्रतिशत है जबकि कश्यप मतदाता पांच प्रतिशत है अन्य मतदाताओं की संख्या लगभग पन्द्रह प्रतिशत है
सहसवान विधानसभा सीट से सर्वप्रथम वर्ष 1952 में मुस्ताक अली विधायक बने जो कस्बा सहसवान के मोहल्ला सैफुल्ला गंज के निवासी थे उसके बाद वर्ष 1957 से 1962 तक चौधरी उल्फत सिंह विधायक चुने गए जो दहगंवा के निवासी थे वर्ष 1967 मैं अशर्फीलाल जनसंघ से विधायक बने वह भी दहगंवा के रहने वाले थे। वर्ष 1969 से 1974 तक शांति देवी यादव विधायक रही वर्ष 1977 में नरेश पाल सिंह यादव और वर्ष 1980 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां विधायक बने वर्ष 1985 में फिर नरेश पाल सिंह यादव और वर्ष 1989 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां विधायक रहे।

वर्ष 1991 में पहली बार ओंकार सिंह यादव विधायक चुने गए वर्ष 1993 में एक बार फिर मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां विधायक रहे। विधायक रहते मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां का निधन हो गया और वर्ष 1995 में उपचुनाव हुए और मीर मजहर अली के भाई मीर अफजल अली उर्फ अच्छे मियां चुनाव जीते। वर्ष 1996 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़े और रिकॉर्ड मतो से जीत हासिल की बाद में उन्होंने सहसवान से इस्तीफा दे दिया वर्ष 1998 से 2002 तक ओंकार सिंह यादव विधायक रहे वर्ष 2007 के चुनाव में डी पी यादव विधायक चुने गए वर्ष 2012 और वर्ष 2017 के चुनाव में ओंकार सिंह यादव ने जीत दर्ज कर सपा का परचम लहराया । विगत वर्षों में हुए विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तब साफ तौर पर स्पष्ट हो जाता है कि सहसवान की जनता ने विकास के मुद्दों को दरकिनार कर जातिगत आधार पर चुनाव जिताया इसी का नतीजा है कि सहसवान विधानसभा विकास के कार्यों में जनपद की सभी विधानसभाओं मे सबसे पीछे है।

सहसवान की जनता से चुनाव जीते जनप्रतिनिधियों ने विकास के तमाम वायदे तो किए मगर चुनाव जीतने के बाद जनता के बीच की गए वायदों पर अमल करना जनप्रतिनिधियों ने उचित नहीं समझा इसी का नतीजा है कि सहसवान के बाशिंदों को कुछ मिलने के बजाए यहां से मुख्य टेलीफोन एक्सचेंज, मुख्य डाकघर, चले गए। सहसवान तहसील से तमाम गांव काटकर बिल्सी और गुन्नौर तहसील में शामिल कर दिए मगर बदले में सहसवान को कुछ नहीं मिला। अब देखना है कि आने वाले चुनाव में सहसवान की जनता किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधेगी यह तो समय ही बताएगा ।

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