आंतरिक विरोध या अंतरराष्ट्रीय टकराव की आहट?
डिजिटल डेस्क | आंचलिक ख़बरें |
ईरान में बीते कुछ समय से हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। महंगाई, बेरोज़गारी, महिलाओं की आज़ादी पर पाबंदियां, इंटरनेट बैन और सख्त इस्लामिक कानून—इन सबके खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हैं। अब यह आंदोलन सिर्फ सुधार की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम से जवाब मांगा जा रहा है। सरकार का दावा है कि यह सब ‘विदेशी साज़िश’ का नतीजा है, जबकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह उनकी ज़िंदगी और अधिकारों का सवाल है।
डोनाल्ड ट्रंप का बयान और नया मोड़
इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump मैदान में कूद पड़े।ट्रंप ने ईरान के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि ईरानी जनता तानाशाही शासन से आज़ादी चाहती है और अमेरिका को उनके साथ खड़ा होना चाहिए।
यह बयान केवल मानवाधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी राजनीति और मिडिल ईस्ट की ताकत की लड़ाई से भी जुड़ा माना जा रहा है। याद दिला दें कि ट्रंप वही नेता हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में ईरान न्यूक्लियर डील को तोड़ा, कड़े प्रतिबंध लगाए और ईरान को “सबसे बड़ा खतरा” बताया था।
खामेनेई की सख्त चेतावनी
ट्रंप के बयान के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की प्रतिक्रिया सामने आई—और वह किसी कूटनीतिक भाषा में नहीं थी।
खामेनेई ने साफ कहा, “ईरान के अंदरूनी मामलों में दखल देने वालों को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।”
ईरानी नेतृत्व का आरोप है कि अमेरिका, इज़रायल और पश्चिमी देश इन आंदोलनों को हवा दे रहे हैं ताकि ईरान को अंदर से कमजोर किया जा सके।
ट्रंप की राजनीति बनाम खामेनेई की विचारधारा
ट्रंप के लिए यह मौका है खुद को “तानाशाही के खिलाफ नेता” के रूप में पेश करने का, जबकि खामेनेई के लिए यह लड़ाई इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता बचाने की है।
दुनिया पर क्या पड़ेगा असर
अगर यह तनाव और बढ़ा तो इसके असर ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे।
-
तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है
-
मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा बढ़ सकता है
-
अमेरिका-ईरान संबंध और अधिक बिगड़ सकते हैं
सबसे बड़ा सवाल
क्या ईरानी जनता की आवाज़ वैश्विक राजनीति की भेंट चढ़ जाएगी? या यह आंदोलन वाकई बदलाव की शुरुआत बनेगा?

