अशोक गहलोत एवं राजकुमार शर्मा नवलगढ़ में दोनों एक दूसरे से मुलाकात करेंगे
झुंझुनू। राजनीति अनंत संभावनाओं वाला एक ऐसा खेल है, जिसमें संघर्ष, चुनौती, शह-मात, आरोप-प्रत्यारोप, हर पल चलते ही रहते हैं। यहां जीतने वाले को जहां लगातार जीतते रहने के लिए प्रयासरत रहना पड़ता है, तो वहीं हारने वाले को ‘बाजीगर’ बनने के लिए जुटना पड़ता है। राजकुमार शर्मा एवं सीएम अशोक गहलोत दोनों ही इस खेल में लगातार खेलने वाले खिलाडियों में माने जाते हैं।
सीएम अशोक गहलोत जहां 5 बार सांसद, 5 बार विधायक, 3 बार सीएम रह चुके हैं, तो राजकुमार शर्मा भी बिना किसी जातिगत आधार के भी नवलगढ़ से लगातार 3 बार विधायक बन रहे हैं। 1 बार राज्यमंत्री तो एक बार मुख्यमंत्री के सलाहकार बन चुके हैं।
पद प्राप्त करने की उपलब्धि को छोड़ भी दिया जाए, तो दोनों नेता अपने कार्यकर्ताओं में ‘काम करवाने वाले’ और ‘खयाल रखने वाले’ नेता के रूप में जाने जाते हैं। यह किसी भी नेता के लिए पद से ज्यादा बड़ा उपहार होता है कि आमजन उसे अपने पैरोकार, खयाल रखने वाले नेता के रूप में याद करें, क्योंकि पद मिलना भाग्य की बात होती है, लेकिन परोपकारी नेता के रूप में छवि बनाना, आपकी मेहनत, समर्पण और जनता का प्यार होता है।

राजकुमार शर्मा अक्सर अपने भाषणों में अशोक गहलोत को अपना ‘गुरु’ बताने में कोई परहेज नहीं करते, तो सीएम गहलोत भी अपने भाषणों में उन्हें ‘हीरो’ कहकर जताते हैं कि वे उनके कितने चहेते हैं। गुरु-चेलों की एक और समानता यह भी है कि दोनों ही विशुद्ध गांधीवादी हैं।
CM अशोक गहलोत को राजकुमार शर्मा अपना ‘गुरु’ मानते हैं

गांधीवादी यानी अपना बुरा करने वाले या अहित चाहने वालों का भी बुरा नहीं करना, उन्हें माफ कर देना, भूलो और आगे बढ़ो की नीति पर चलना।
यही वजह है कि सीएम गहलोत ने जहां इस बार मानेसर जाने वाले विधायकों को भी माफ किया, तो वहीं नवलगढ विधायक राजकुमार शर्मा भी पार्टी में ही उनके खिलाफ मुखर होकर टिकट मांगने वालों को भी माफ करके जीतने पर साथ ले लेते हैं। दरअसल यही एक सफल राजनेता का गुण होता है।
हाल ही में कुछ जातियों के स्वयं भू नेता ‘मलाई’ नहीं मिलने पर नाराज़ होकर दूसरे प्रत्याशियों को समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हर चुनाव में इस तरह की हरकतें करने वाले कथित नेता यह भूल जाते हैं कि उन्हें विरोध करने तक का कद देने वाले सीएम गहलोत और राजकुमार शर्मा ‘पुनर्मुसको भव:’ का आशीर्वाद भी दे सकते हैं।
बहरहाल सीएम गहलोत पिछली बार भी नवलगढ़ आए थे, क्योंकि सैनी समाज के यहां बड़ी संख्या में वोट हैं। उनके आने का ही परिणाम था कि राजकुमार शर्मा यहां रिकॉर्ड तोड़ मतों से जीते।
इस बार वापस चुनाव से ठीक पहले सीएम गहलोत का नवलगढ़ आना यह दर्शाता है कि मुकाबला चाहे, आमने सामने का हो, चाहे त्रिकोणीय, सीएम गहलोत के एक ईशारे पर सैनी समाज राजकुमार शर्मा के साथ फिर से खड़ा होगा और नतीजे भी कमोबेश 2018 वाले ही हो सकते हैं। यानी गांधीवादी गुरु-चेले का रिश्ता अटूट है, जो फेविकोल के जोड़ से भी निरंतर मजबूत बनता रहेगा और सांप्रदायिकता, संकीर्णता के इस दौर में भी अपनी अलग सौहार्द्रपूर्ण खुशबू बिखेरता रहेगा।
संजय सोनी
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